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Wednesday, April 27, 2011

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aaj desh ke bare me sochta hi kaun hai? netaaon ko apni jebe bharne se hi furshat nahi hai. aaye din naye naye ghotale samne aajate hain. aam aadmi to in ghotalo se aur inse hone wali mahgayee se hi paresaan hai. corruption itna ki sarkari naukri  ke to sare raste hi band ho gaye hain. log kule aam paise ki demand karte hai. aur hain demand bhi todi bahut nahi lakhon me hoti hai jo ek sadharan vyakti ke bas ka nahi. Kai vibhaag aise bhi hain jahan vacancy create hoti hain, vgyapan nikalta hai, aavedan/ pariksha sulk ke naam par 400 / 500/ 1000 rupaye le lete hain aur sari aupchariktayen poori hone ke baad bhi result out nahi hota kyun ki kahi koi neta ki sipharis hoti hai ye kahi paisa nahi pahunchta. kya hoge bhavisye me , mai yahi soch kar kabhi kabhi vyathit ho jata hoon. kya is desh se bharastachar katam ho payega aur ye neta nagri wale log sudhar payenge ya phirr.........
Vinay Mishra27 अप्रैल 13:25
aaj desh ke bare me sochta hi kaun hai? netaaon ko apni jebe bharne se hi furshat nahi hai. aaye din naye naye ghotale samne aajate hain. aam aadmi to in ghotalo se aur inse hone wali mahgayee se hi paresaan hai. corruption itna ki sarkari naukri ke to sare raste hi band ho gaye hain. log kule aam paise ki demand karte hai. aur hain demand bhi todi bahut nahi lakhon me hoti hai jo ek sadharan vyakti ke bas ka nahi. Kai vibhaag aise bhi hain jahan vacancy create hoti hain, vgyapan nikalta hai, aavedan/ pariksha sulk ke naam par 400 / 500/ 1000 rupaye le lete hain aur sari aupchariktayen poori hone ke baad bhi result out nahi hota kyun ki kahi koi neta ki sipharis hoti hai ye kahi paisa nahi pahunchta. kya hoge bhavisye me , mai yahi soch kar kabhi kabhi vyathit ho jata hoon. kya is desh se bharastachar katam ho payega aur ye neta nagri wale log sudhar payenge ya phirr.........

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-शातिर है संजीव भट्ट
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शातिर है संजीव भट्ट

फोटोग्राफी के शौक़ीन आई पी एस अधिकारी संजीव भट्ट का सुप्रीम कोर्ट में दिया गया हलफनामा कि मोदी मुसलमानों को सबक सिखाना चाहते थे ,मोदी के विवादस्पद व्यक्तित्व में एक और पैबंद लगाने का काम करेगा। लेकिन मोदी के सत्ता में आने के बाद हाशिये पर रख दिए गए संजीव भट्ट कौन है, कैसा है इनका व्यक्तित्व? ये जानना भी फिलहाल बेहद जरुरी है।

चलिए चलते हैं मई १९९६ में ,गुजरात के पालनपुर पुलिस स्टेशन में एन डी पी एस एक्ट के तहत एक केस दर्ज किया गया जिसमे कहा गया था कि सुमेर सिंह नाम का एक व्यक्ति पालनपुर के होटल लाजवंती में पांच किलो अफीम का सौदा करने वाला है ,पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची और होटल रजिस्टर से कथित तौर पर मिली जानकारी के आधार पर रूम न -५०३ में जा पहुंची ,दरवाजा खोला गया तो वहां कोई व्यक्ति नहीं मिला हाँ पुलिस के रिकार्ड के आधार पर १ किलो १५ ग्राम हेरोइन जरुर मिली। संजीव भट्ट उस वक्त पालनपुर के डीएसपी थे उनके आदेश पर एक टीम पाली, राजस्थान रवाना की गयी और फिर २ मई १९९६ को सुमेर सिंह को गिरफ्तार कर वापस गुजरात ले आया गया।

१४ दिन की रिमांड के बाद जब अभियुक्त को वापस सीजीएम कोर्ट में प्रस्तुत किया गया तो एक अजीबोगरीब बात हुई ,जिस व्यक्ति को संजीव भट्ट ने अदालत के सामने पस्तुत किया था उसने बताया कि मै सुमेर सिंह एक वकील हूँ ,जो कभी पालनपुर आया ही नहीं जिस घर को मेरा घर बताया जा रहा है वो मेरा घर है ही नहीं, मेरा मकान मालिक के साथ विवाद भी चल रहा। जज ने १५ से ३० घंटे के भीतर शिनाख्त परेड कराये जाने का आदेश देते हुए अभियुक्त को सात दिन की और रिमांड दे दी |शिनाख्त परेड बुलाई गयी, लेकिन लाजवंती होटल के कर्मियों ने अभियुक्त की शिनाख्त होटल में रुके व्यक्ति के रूप में करने से साफ़ इनकार कर दिया। नतीजतन पुलिस ने कोर्ट में सुमेर सिंह की बात मान ली और उसे १० हजार रूपए के निजी मुचलके पर छोड़ दिया गया।

संजीव भट्ट की कहानी यहाँ से ख़त्म नहीं होती ,यहीं से शुरू होती है। १७ अक्तूबर को सुमेर सिंह ने सीजीएम कोर्ट में एक अपील दाखिल की ,जिसमे बताया गया था कि पाली स्थित जिस घर में उसका चेंबर है है उस मकान के मालिक से उसका मुकदमा चल रहा है। दरअसल वो घर गुजरात हाई कोर्ट के जज के के जैन के सगे चाचा का है ,और ये लोग मुझ पर लगातार वो जगह खाली करने को कह रहे हैं ,जब मैंने मना किया तो जस्टिस आर आर जैन और संजीव भट्ट जो कि बहुत घनिष्ठ मित्र है (संजीव भट्ट की पत्नी भी जैन है )ने एक शातिराना चाल चली ,और मुझे ड्रग माफिया घोषित करने के लिए जस्टिस के के जैन के कहने पर मुझे भट्ट ने एन ड़ी पी एस के मामले में फंसा दिया |सबूत के तौर पर सुमेर सिंह ने कुछ आडियो टेप भी अदालत को दिए जिससे पृष्टि हुई कि संजीव भट्ट और के के जैन में प्रगाढ़ मित्रता ही नहीं पारिवारिक सम्बंध भी रहे हैं।

सुमेर सिंह ने अदालत को बताया कि संजीव भट्ट अपने जज मित्र के लिए मुझ पर लगातार दबाव बना रहे थे ,और अंत में मुझे इस मामले में जबरन गिरफ्तार भी कर लिया गया। इस मामले में अदालत के निर्देश पर तत्काल एक केस दर्ज किया गया जिसमे संजीव भट्ट जस्टिस आरआर जैन और उनके चाचा फुटरमल को अभियुक्त बनाया गया था, फुटरमल को तत्काल गिरफ्तार कर लिया गया इस मामले को संज्ञान में लेकर गुजरात बार एसोसिएशन ने जस्टिस आरआर जैन के खिलाफ निंदा प्रसताव भी पारित किया और तत्कालीन चीफ जस्टिस ए एन अहमदी को उनके खिलाफ कार्यवाही करने को भी पत्र लिखा ,लेकिन कार्यवाही तब हुई जब जस्टिस वर्मा मुख्य न्यायाधीश बने ,आर आर जैन को गुजरात से मद्रास हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया गया वहीँ संजीव भट्ट के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हो गयी। संजीव भट्ट ने लगातार कोशिश की कि उसके खिलाफ चल रहा मामला राजस्थान से गुजरात स्थानांतरित हो जाए मगर सुप्रीम कोर्ट ने उनकी एक न सुनी।

इस पूरे मामले में सुमेर सिंह ने अदालत को कुछ टेप सौंपे जिनमे साफ़ तौर पर जैन के चाचा फुटरमल और संजीव भट्ट की बातचीत मौजूद थी ,बाद में अदालत में संजीव भट्ट ने खुद कबूला कि उन्हें आर आर जैन लगातार फोन कर रहे थेऔर उनके तथा उनकी पत्नी के जैन दंपत्ति से अच्छे सम्बंध है। इस मामले में मिले रिकार्ड्स से ये भी जानकारी मिली कि जब सुमेर सिंह की गिरफ्तारी के बाद उसे छोड़े जाने के एवज में सुमेर सिंह के परिजन पाली स्थित जैन के मकान में बने चेंबर को खाली करने पर राजी हो गए ,तो पुलिस ने कोर्ट को सुमेर सिंह को छोड़ने जाने की दरख्वास्त कर दी।


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मालेगाँव बम ब्लास्ट की प्रमुख आरोपी के रूप में महाराष्ट्र सरकार द्वारा “मकोका” कानून के तहत जेल में निरुद्ध, साध्वी प्रज्ञा को देवास (मप्र) की एक कोर्ट में पेशी के लिये कल मुम्बई पुलिस लेकर आई। साध्वी के चेहरे पर असह्य पीड़ा झलक रही थी, उन्हें रीढ़ की हड्डी में तकलीफ़ की वजह से बिस्तर पर लिटाकर ही ट्रेन से उतारना पड़ा। कल ही उन्हें देवास की स्थानीय अदालत में पेश किया गया, परन्तु खड़े होने अथवा बैठने में असमर्थ होने की वजह से जज को एम्बुलेंस के दरवाजे पर आकर साध्वी प्रज्ञा (Sadhvi Pargya) से बयान लेना पड़ा। यहीं पर डॉक्टरों की एक टीम द्वारा उनकी जाँच की गई और रीढ़ की हड्डी में असहनीय दर्द की वजह से उन्हें अस्पताल में भर्ती करने की सलाह जारी की गई। मुम्बई में मकोका कोर्ट ने प्रज्ञा के स्वास्थ्य को देखते हुए उन्हें ट्रेन में AC से ले जाने की अनुमति दी थी, बावजूद इसके महाराष्ट्र पुलिस उन्हें स्लीपर में लेकर आई।(Harsh Treatment to Sadhvi Pragya)


इससे पहले भी कई बार विभिन्न अखबारी रिपोर्टों में साध्वी प्रज्ञा को पुलिस अभिरक्षा में प्रताड़ना, मारपीट एवं धर्म भ्रष्ट करने हेतु जबरन अण्डा खिलाने जैसे अमानवीय कृत्यों की खबरें आती रही हैं।

साध्वी प्रज्ञा से सिर्फ़ इतना ही कहना चाहूँगा कि एक “धर्मनिरपेक्ष”(?) देश में आप इसी सलूक के लायक हैं, क्योंकि हमारा देश एक “सेकुलर राष्ट्र” कहलाता है। साध्वी जी, आप पर मालेगाँव बम विस्फ़ोट (Malegaon Blast) का आरोप है…। ब्रेन मैपिंग, नार्को टेस्ट सहित कई तरीके आजमाने के बावजूद, बम विस्फ़ोट में उनकी मोटरसाइकिल का उपयोग होने के अलावा अभी तक पुलिस को कोई बड़ा सबूत हाथ नहीं लगा है, इसके बावजूद तुम पर “मकोका” लगाकर जेल में ठूंस रखा है और एक महिला होने पर भी आप जिस तरह खून के आँसू रो रही हैं… यह तो होना ही था। ऐसा क्यों? तो लीजिये पढ़ लीजिये –

1) साध्वी प्रज्ञा… तुम संसद पर हमला करने वाली अफ़ज़ल गुरु (Afzal Guru) नहीं हो कि तुम्हें VIP की तरह “ट्रीटमेण्ट” दिया जाए, तुम्हें सुबह के अखबार पढ़ने को दिये जाएं, नियमित डॉक्टरी जाँच करवाई जाए…

2) साध्वी प्रज्ञा… तुम “भारत की इज्जत लूटने वाले” अजमल कसाब की तरह भी नहीं हो कि तुम्हें इत्र-फ़ुलैल दिया जाए, स्पेशल सेल में रखा जाए, अण्डा-चिकन जैसे पकवान खिलाए जाएं… तुम पर करोड़ों रुपये खर्च किये जाएं…

3) साध्वी प्रज्ञा… तुम बिनायक सेन (Binayak Sen) भी तो नहीं हो, कि तुम्हारे लिये वामपंथी, सेकुलर और “दानवाधिकारवादी” सभी एक सुर में “रुदालियाँ” गाएं…। न ही अभी तुम्हारी इतनी औकात है कि तुम्हारी खातिर, अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर “चर्च की साँठगाँठ से कोई मैगसेसे या नोबल पुरस्कार” की जुगाड़ लगाई जा सके…

4) साध्वी प्रज्ञा… तुम्हें तो शायद हमारे “सेकुलर” देश में महिला भी नहीं माना जाता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो जो “महिला आयोग”(?) राखी सावन्त/मीका चुम्बन जैसे निहायत घटिया और निजी मामले में दखल दे सकता है… वह तुम्हारी हालत देखकर पसीजता…

5) साध्वी प्रज्ञा… तुम तो “सो कॉल्ड” हिन्दू वीरांगना भी नहीं हो, क्योंकि भले ही तुम्हारा बचाव करते न सही, लेकिन कम से कम मानवीय, उचित एवं सदव्यवहार की माँग करते भी, किसी “ड्राइंगरूमी” भाजपाई या हिन्दू नेता को न ही सुना, न ही देखा…

6) और हाँ, साध्वी प्रज्ञा… तुम तो कनिमोझी (Kanimojhi) जैसी “समझदार” भी नहीं हो, वरना देश के करोड़ों रुपये लूटकर भी तुम कैमरों पर बेशर्मों की तरह मुस्करा सकती थीं, सेकुलर महिला शक्ति तुम पर नाज़ करती… करोड़ों रुपयों में तुम्हारा बुढ़ापा भी आसानी से कट जाता… लेकिन अफ़सोस तुम्हें यह भी करना नहीं आया…

7) साध्वी प्रज्ञा… तुम्हारे साथ दिक्कत ये भी है कि तुम अरुंधती रॉय (Arundhati Roy’s Anti-National Remarks) जैसी महिला भी नहीं हो, जो सरेआम भारत देश, भारतवासियों, भारत की सेना सहित सभी को गरियाने के बावजूद “फ़ाइव स्टार होटलों” में प्रेस कांफ़्रेंस लेती रहे…

8) साध्वी प्रज्ञा… तुम तो पूनम पाण्डे जैसी छिछोरी भी नहीं हो, कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र के “परिपक्व मीडिया”(?) की निगाह तुम पर पड़े, और वह तुम्हें कवरेज दे…

कहने का मतलब ये है साध्वी प्रज्ञा… कि तुम में बहुत सारे दोष हैं, जैसे कि तुम “हिन्दू” हो, तुम “भगवा” पहनती हो, तुम कांग्रेसियों-वामपंथियों-सेकुलरों के मुँह पर उन्हें सरेआम लताड़ती हो, तुम फ़र्जी मानवाधिकारवादी भी नहीं हो, तुम विदेशी चन्दे से चलने वाले NGO की मालकिन भी नहीं हो… बताओ ऐसा कैसे चलेगा?

सोचो साध्वी प्रज्ञा, जरा सोचो… यदि तुम कांग्रेस का साथ देतीं तो तुम्हें भी ईनाम में अंबिका सोनी या जयन्ती नटराजन की तरह मंत्रीपद मिल जाता…, यदि तुम वामपंथियों की तरफ़ “सॉफ़्ट कॉर्नर” रखतीं, तो तुम भी सूफ़िया मदनी (अब्दुल नासेर मदनी की बीबी) की तरह आराम से घूम-फ़िर सकती थीं, NIA द्वारा बंगलोर बस बम विस्फ़ोट की जाँच किये जाने के बावजूद पुलिस को धमका सकती थीं… यानी तुम्हें एक “विशेषाधिकार” मिल जाता। बस तुम्हें इतना ही करना था कि जैसे भी हो "सेकुलरिज़्म की चैम्पियन" बन जातीं, बस… फ़िर तुम्हारे आगे महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग, सब कदमों में होते। महिलाओं के दुखों और पीड़ा को महसूस करने वाली तीस्ता जावेद सीतलवाड, शबाना आज़मी, मल्लिका साराभाई सभी तुमसे मिलने आतीं… तुम्हें जेल में खीर-मलाई आदि सब कुछ मिलता…।

लेकिन अब कुछ नहीं किया जा सकता… जन्म ने तुम्हें “हिन्दू” बना दिया और महान सेकुलरिज़्म ने उसी शब्द के आगे “आतंकवादी” और जोड़ दिया…। साध्वी प्रज्ञा, इस “सेकुलर, लोकतांत्रिक, मानवीय और सभ्य” देश में तुम इसी बर्ताव के लायक हो…
"आचरण और व्याकरण की तंग गलियों से गुजरते शब्द की सिसकी सुनी तुमने ?
सुनो ! संवेदना के सेतु से जाता हुआ वह हादसा देखो !!
बताओ लय-प्रलय के द्वंद्व के इस दौर में जो जन्मा है सृजन है क्या ?
फिर न कहना इस उदासी से कभी, ढह चुके विश्वास के टुकड़े उठाये --
दूर तक इस दर्द का विस्तार जिन्दगी के छोर का स्पर्ष करता है
देख पाओ तो तुम भी देखो जिन्दगी के उस तरफ
रात के बोझिल पलों में बूढ़े बरगद की टहनी जब खड़कती है तो चिड़िया काँप जाती है
आचरण और व्याकरण की तंग गलियों से गुजरते शब्द की सिसकी सुनी तुमने ?

सुनो ! संवेदना के सेतु से जाता हुआ वह हादसा देखो !!
"

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" मां न बनने का सामान जब मिलता हो दुकानों पर
तख्तियां भी टंग गयी हों गली कूचे और मकानों पर
उसी तेरी बदनाम बस्ती में तब से रोज आया हूँ
जहां मुझको फेंक गयी थी मां मैं तुझको खोज आया हूँ
कभी कातिल लोक लाजों का तकाजा मुझसे मत करना
जहां से लोग जाते हैं वो रस्ते छोड़ आया हूँ." -- राजीव चतुर्वेदी

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संजय कुमार
क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख राजस्थान
Website: www.patheykan.in

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लंदन.अमेरिकी अधिकारियों ने पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई को आतंकवादी संगठन करार दिया है। अमेरिका का मानना है कि आईएसआई, अल-कायदा और तालिबान जितना ही खतरनाक संगठन है। अमेरिका द्वारा ग्वांतानामो बे में अफगानिस्तान और इराक से लाए गए बंदियों में अल-कायदा, हमास, हिजबुल्ला के आतंकियों के साथ आईएसआई के लोग भी शामिल थे।

लंदन के ‘दि गार्जियन’ अखबार ने एक रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ‘इनमें से किसी भी संगठन से जुड़ा होना आतंकवादी या विद्रोही गतिविधियों का संकेत है।’ अफगानिस्तान में आईएसआई द्वारा तालिबान की मदद करने की जानकारी भी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को मिलती रही है, यह खुलासा भी इस रिपोर्ट में हुआ है।

आतंक संकेतक सूची में भी शामिल : आतंक संकेतक सूची ‘मैट्रिक्स’ में आईएसआई को 36 अन्य आतंकी संगठनों के साथ रखा गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि हालांकि यह सूची 2007 की है लेकिन आईएसआई को अभी भी इस सूची से नहीं हटाया गया।

बंदी बनाए गए आतंकियों ने की पुष्टि: ग्वांतानामो बे में 2007 में बंदी बनाकर भेजे गए आतंकी हारुन शिरजाद अल-अफगानी ने अधिकारियों को इस बारे में जानकारी दी है। उसने बताया कि 2006 में एक मीटिंग में उसके साथ पाकिस्तानी सेना और आईएसआई अधिकारियों ने हिस्सा लिया था। उसने यह भी बताया कि 2006 में ही आईएसआई अधिकारी ने एक आतंकी को अफगानिस्तान में हथियार पहुंचाने के लिए दस लाख रुपए दिए थे।

रिश्तों में पड़ सकती है दरार

आईएसआई को तालिबान का मददगार कहने पर पाकिस्तान में रोष की आशंका जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ‘यह जानकारी अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और आईएसआई के बदहाल रिश्तों को और ज्यादा नुकसान पहुंचाएगी।’


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संजय कुमार
क्षेत्रीय प्रचार प्रमुख राजस्थान
Website: www.patheykan.in

Sunday, April 24, 2011

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सहसा यह विश्वास ही नहीं होता कि आजाद भारत के राजनेता किस दुस्साहस के साथ जनता द्वारा उठाये गये मुद्दों को नकारने में लगे हैं। क्या भ्रष्टाचार के समर्थन या विरोध के बारे में भी कोई दो राय भी हो सकती हैं ? यह साफ साफ समझे जाने की आवश्यकता है कि भारत की जनता के लिये ना तो बाबा रामदेव महत्वपूर्ण हैं और ना ही अन्ना हजारे। उसके लिये महत्व इस बात का है कि वह तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त हो चुकी है और यदि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस मुद्दे पर अपने पद को छोड़कर जनता के आव्हान में शामिल होते हैं तो भारत की जनता उन्हैं भी बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की तरह अपनी पलकों पर बिठा लेगी। अब यह तय मनमोहन सिंह को करना है कि उनमें अपनी ईमानदारी को साबित करने का दम है भी या नहीं।

केन्द्र सरकार जिस प्रकार से भ्रष्टाचार को नकार रही है, उसके लिये भ्रष्टाचार का जीता जागता उदाहरण आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0 वाई0 एस0 आर0 रेड्डी के पुत्र जगनमोहन रेड्डी ने प्रस्तुत किया है। आगामी 8 मई को कड्डपा लोकसभा क्षेत्र के लिये होने वाले उपचुनावों के लिए जगनमोहन रेड्डी ने निर्वाचन आयोग को अपनी संपत्ति 365 करोड़ रूपये बताई है, जबकि 2009 में जब उन्होंने निर्वाचन आयोग को अपनी संपत्ति मात्र 77 करोड़ रूपये बताई थी। मात्र 23 महिनों में ही उनकी संपत्ति 5 गुना तक बढ़ गई । यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि स्व0 वाई0 एस0 आर0 रेड्डी कांग्रेस सरकार के ना केवल मुख्यमंत्री थे, बल्कि कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गांधी के विश्वासपात्रों में से भी एक थे। उनकी आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके पुत्र को कांग्रेस ने मुख्यमंत्री नहीं बनाया इसीलिये उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर नइ पार्टी बना ली। इसके विपरीत दूसरी तरफ भारत के संभ्रांत नागरिक हैं जिनके द्वारा दिये गए आयकर से भारत सरकार को अब तक की सबसे बड़ी आय हुई है। हाल ही में एक समाचार ये भी आया है कि भारत सरकार को इस बार आयकर के रूप में 456 लाख करोड़ रूपयों की आमदनी हुई है। प्रश्न यह है कि भारत का रहने वाला नागरिक क्या इसलिये कर चुकाता है कि वह पैसा देश के विकास की बजाय इन नेताओं की जेबों में जाये।

दरअसल, भारत के राजनेताओं ने चुनावों को अपनी सुरक्षा का हथियार बना लिया है। ये लोग पैसे के बल पर ही सत्ता प्राप्त करते हैं, और सत्ता में आने के बाद वही पैसा कमाने के लिए लोकतंत्र की कमियों का फायदा उठाते हैं। प्रश्न यह भी है कि क्या लोकतंत्र का अर्थ जनता की आवाज को अनसुना करना ही होता है, क्या चुनावों का उत्सव इसलिये मनाया जाता है कि देश को जाति, वर्ग , भाषा में बांटकर सत्ता सुख की प्राप्ति की जा सके, और जिन मतदाताओं ने राजनीतिक दलों को सत्ता चलाने का अधिकार दिया है, उनकी आवाज को घोंट दिया जाए। आखिर वो कौनसी शिक्षा है जिसके चलते जो भी व्यक्ति जनप्रतिनिधि निर्वाचित हो जाता है, वह सदन में पहुंचते ही जनता के मुद्दों को गौण समझने लगता है और सत्ता को सर्वोच्च । आखिर कैसे जनप्रतिनिधियों को सदन में पहुँचते ही यह विशिष्ट योग्यता हासिल हो जाती है कि वे जनता की मांगों को शासक की अवज्ञा के रूप में लेने के लिये स्वतंत्र हो जाते हैं और शासन के प्रति अवज्ञा को कुचलने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इन राजनेताओं ने लोकतंत्र जैसे वरदान को अभिशाप में बदल दिया है, इसी कारण नागरिकों का एक बड़ा वर्ग मतदान के प्रति अरूचि व्यक्त करने लगा है।

पहले बाबा रामदेव और अब अन्ना हजारे को भ्रष्ट साबित करने में अपनी उर्जा को खपा रहे राजनीतिक दलों के राजनेता क्या यह साबित करना चाहते हैं कि जो भी व्यक्ति भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलेगा, वे उस व्यक्ति को भी भ्रष्टाचार के दल दल में घसीट लेने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ेंगे । इसलिये जो भी व्यक्ति अपनी ईमानदारी को बचाकर रखना चाहते हैं वे भ्रष्टाचार के खिलाफ एक शब्द भी न बोलें। क्या यह माना जाए कि यह जनता को शासक वर्ग से मिल रही धमकी है ?

यह स्पष्ट रूप से समझे जाने की जरूरत है कि जो लोग अन्ना हजारे के समर्थन में सड़कों पर उतरे थे, वे केवल प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में शामिल करने की मांग पर नहीं आये थे। वे चाहते थे कि अन्ना हजारे भ्रष्ट मंत्रियों और अधिकारियों के खिलाफ होने वाले लोकतान्त्रिक आंदोलन के ठीक उसी प्रकार वाहक बनें जैसा कि जयप्रकाश नारायण ने 1975 में इंदिरा गांधी के अलोकतांत्रिक व्यवहार व सरकार के विरूद्ध किया था। लेकिन सत्ता में बैठे लोग अपने प्रभाव और पैसे के कारण भारत के नागरिकों को गुमराह करने की कोशिश कर रहे हैं।

अच्छा तो यह होता कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र का दंभ भरने वाले राजनेता भ्रष्टाचार पर देश भर में चल रही बहस को देखते हुए इस मुद्दे पर संसद में बात करते, और जनता को यह विश्वास दिलाते कि भारत के राजनीतिक दल भी भ्रष्टाचार को जड़मूल से समाप्त करने के लिए कृतसंकल्पित हैं। प्रश्न यह है कि क्यों नहीं इस विषय पर सभी राजनीतिक दल अपने मतदाताओं को विश्वास दिलाने के लिये आमराय बनाते कि वे सब उस व्यवस्था को समाप्त करने के लिए संकल्पित हैं, जो भ्रष्टाचार की जननि है।

क्या वे इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि भारत के नागरिक अवज्ञा पर उतर जायें और सरकारों को सभी प्रकार के कर देने से मना कर दें। क्यों नहीं भारत के तमाम राजनेता भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनमत संग्रह कराने का साहस दिखाते? या केन्द्र सरकार भ्रष्टाचार पर एक श्वेत पत्र जारी करती जो भारत की जनता को यह बता सके कि सरकार की नजर में देश में भ्रष्टाचार की क्या स्थिति है ? या जनता को ही यह अधिकार देते कि वह अपने द्वारा निर्वाचित जनप्रतिनिधि को वापस भी बुला सकती है।

स्व0 प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी जब नए नए प्रधानमंत्री बने थे, तो उन्होंने यह कहने का साहस दिखाया था कि केन्द्र सरकार से चला एक रूपया गांव तक आते आते 15 पैसा रह जाता है, ये बात अलग है कि बाद में उन्हीं राजीव गांधी पर बोफोर्स तोप के सौदे में दलाली खाने का आरोप लगा। उसी तरह का साहस स्व0 राजीव की पत्नी श्रीमती सोनिया गांधी के मार्गदर्शन में चलने वाली मनमोहन सिंह की सरकार क्यों नहीं कर पा रही है? प्रश्न यह भी महत्वपूर्ण है कि श्रीमती सोनिया गांधी की ऐसी कौनसी दुविधा है, जो उन्हैं अपने स्व0 पति की व्यथा को दूर करने से रोक रही है। क्या यह माना जाए कि उनके मार्गदर्शन में चलने वाली सरकारों में हो रहे भ्रष्टाचार को उनकी स्वीकृति प्राप्त है?

जरूरत इस बात की है कि विभिन्न राज्यों में सत्ता का सुख भोग रहे और भोग चुके राजनीतिक दल भ्रष्टाचार के बारे में अपने मत को स्पष्ट करें, इस मुद्दे उनकी टालमटोल की नीति का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे भ्रष्टाचार का समर्थन करते हैं और आज के हालात में भ्रष्टाचार को अपरिहांर्य मानते हैं। हमें यह याद रखना होगा कि इस देश ने सदियों से अपने उपर हुए आक्रमणों को झेलकर भी अपने आप को बचाए रखा है और जब आक्रमण घर के भीतर से ही हो रहा हो तो जनप्रतिक्रिया कैसी होगी इसके लिए राजनेता भारत का इतिहास एक बार फिर पढ़ लें। अब जवाब राजनेताओं को देना है, देश की जनता उनके निर्णय का इंतजार कर रही है।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी

(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं

Friday, April 15, 2011

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रामदेव को ग़लतफ़हमी, समिति नहीं बदलेगी:
हज़ारे

लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर अन्ना हज़ारे के समर्थन में आने वाले योग गुरु बाबा
रामदेव ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि विधेयक के लिए गठित समिति में शांति भूषण
के होने पर उन्हें व्यक्तिगत तौर पर आपत्ति नहीं है. उनका कहना था कि लोगों ने इस
पर सवाल उठाए थे और उन्होंने लोगों की बात आगे पहुंचाई है.

विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए नागरिक समाज की ओर से पांच सदस्य हैं जिनमें
पूर्व क़ानून मंत्री शांति भूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण भी हैं.

इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अन्ना हज़ारे ने कहा है कि इस समय मकसद लोकपाल
विधेयक का मसौदा तैयार करना है और समिति में कौन है कौन नहीं इस पर बहस नहीं होनी
चाहिए. हज़ारे ने कहा कि वे इस बारे में बाबा रामदेव से बात करेंगे कि देश हित में
वे इस सवाल को न उठाएँ.

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हज़ारे ने लोकपाल विधेयक को संसद के दोनों सदनों में
पारित कराने के लिए 15 अगस्त की समयसीमा रखी है.


स्वामी अग्निवेश पर निगरानी का आदेश -

अन्ना हज़ारे और स्वामी अग्निवेश

पिछले दिनों लोकपाल विधेयक पर अन्ना हज़ारे के अनशन के दौरान

स्वामी अग्निवेश काफ़ी सक्रिय थे

छत्तीसगढ़ की सरकार ने सामाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेश पर

निगरानी रखने की आदेश जारी किए हैं.

राज्य के ख़ुफ़िया विभाग से

कहा गया है कि वह अग्निवेश की हर गतिविधि पर नज़र रखे. इस

आशय का आदेश राज्य के गृह मंत्री ननकीराम कँवर ने जारी किया है.

बीबीसी से एक साक्षात्कार में छत्तीसगढ़ के गृह मंत्री ने आरोप लगाया है

कि बिनायक सेन के साथ-साथ स्वामी अग्निवेश भी माओवादियों के

शहरी नेटवर्क का हिस्सा हैं.

उन्होंने कहा कि डॉक्टर बिनायक सेन

सान्याल

नक्सलियों के शहरी नेटवर्क के लिए काम कर रहे थे और उन्हें लगता है

कि अग्निवेश्जी भी शहरी नेटवर्क में हैं.

कँवर का कहना था कि उन्होंने

"व्यक्तिगत रूप से" पुलिस विभाग से स्वामी अग्निवेश पर निगरानी

रखने का लिखित आदेश दिया है.

इतना ही नहीं गृहमंत्री का कहना है

कि उन संगठनों पर भी नज़र रखी जा रही है जो अपने काय्रक्रमों में

स्वामी अग्निवेश को आमंत्रित करते हैं.


साभार

Murari Sharan Shukla posted in luckhnawi.
कभी भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में शुमार रहे के एन गोविंदाचार्य का नया अभियान भाजपा व संघ की नींद उड़ा सकता है। वह नई राजनीतिक ताकत खड़ा करने जा रहे है जिसमें भाजपा समेत सभी दलों के लोग तो होंगे ही, बाबा रामदेव भी खास तौर पर जुड़ेंगे। इसकी घोषणा जून माह में होने की संभावना है। इसके पहले देश भर में तीव्र जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इस स्थिति में संभावित नुकसान से बचने के लिए भाजपा की कोशिश है कि बाबा रामदेव नई पार्टी न बनाए। राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और भारत विकास संगम की सफलता से उत्साहित गोविंदाचार्य नए राजनीतिक अभियान पर तेजी से काम कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए राष्ट्रवादी मोर्चा के बैनर तले विभिन्न दलों के लोगों को जोड़ने की शुरुआत कर दी है। बृहस्पतिवार को इस मोर्चे की बैठक में भाजपा के पूर्व सांसद बनवारी लाल पुरोहित, लोक सत्ता पार्टी के जयप्रकाश नारायण व छोटे क्षेत्रीय दलों के नेता जुटे। इसके दरवाजे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए खुले हैं। उनका उद्देश्य विकेंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था व देसी सोच वाले विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को साथ लेकर आने की है। राष्ट्रवादी मोर्चा की बृहस्पतिवार को हुई में देश की मौजूदा शासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के साथ नए राजनीतिक विकल्प पर भी चर्चा की गई। इसमें सभी वक्ताओं ने गोविंदाचार्य को चाणक्य की भूमिका में आकर मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कमान सौंपी है। गोविंदाचार्य और बाबा रामदेव अपने इस अभियान को गति देने के लिए देश भर में ग्राम समितियां बनाने के साथ योग कक्षाएं भी लगाएंगे। लगभग ढाई लाख योग कक्षाओं के साथ देश भर के 600 जिलों में यह कार्यक्रम चलेंगे। इसके बाद जून माह में फैसला किया जाएगा कि चुनावी राजनीति में किस तरह से उतरा जाए इसके लिए तीन तरह के विकल्प है। पहला यह कि मौजूदा राजनीतिक दलों में ही ऐसे लोगों को तैयार किया जाए जो चुनाव लड़कर चुनकर संसद में आए। दूसरा, इस विचारधारा के समर्थक निर्दलीय तौर पर चुनाव मैदान में उतरें और तीसरा यह कि नया राजनीतिक दल बनाकर चुनाव मैदान में उतरा जाए।
Murari Sharan Shukla15 अप्रैल 02:17
कभी भाजपा के प्रमुख रणनीतिकारों में शुमार रहे के एन गोविंदाचार्य का नया अभियान भाजपा व संघ की नींद उड़ा सकता है। वह नई राजनीतिक ताकत खड़ा करने जा रहे है जिसमें भाजपा समेत सभी दलों के लोग तो होंगे ही, बाबा रामदेव भी खास तौर पर जुड़ेंगे। इसकी घोषणा जून माह में होने की संभावना है। इसके पहले देश भर में तीव्र जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इस स्थिति में संभावित नुकसान से बचने के लिए भाजपा की कोशिश है कि बाबा रामदेव नई पार्टी न बनाए।
राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और भारत विकास संगम की सफलता से उत्साहित गोविंदाचार्य नए राजनीतिक अभियान पर तेजी से काम कर रहे हैं। उन्होंने इसके लिए राष्ट्रवादी मोर्चा के बैनर तले विभिन्न दलों के लोगों को जोड़ने की शुरुआत कर दी है। बृहस्पतिवार को इस मोर्चे की बैठक में भाजपा के पूर्व सांसद बनवारी लाल पुरोहित, लोक सत्ता पार्टी के जयप्रकाश नारायण व छोटे क्षेत्रीय दलों के नेता जुटे। इसके दरवाजे सभी राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए खुले हैं। उनका उद्देश्य विकेंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था व देसी सोच वाले विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को साथ लेकर आने की है। राष्ट्रवादी मोर्चा की बृहस्पतिवार को हुई में देश की मौजूदा शासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन के साथ नए राजनीतिक विकल्प पर भी चर्चा की गई। इसमें सभी वक्ताओं ने गोविंदाचार्य को चाणक्य की भूमिका में आकर मौजूदा भ्रष्ट व्यवस्था को उखाड़ फेंकने की कमान सौंपी है।
गोविंदाचार्य और बाबा रामदेव अपने इस अभियान को गति देने के लिए देश भर में ग्राम समितियां बनाने के साथ योग कक्षाएं भी लगाएंगे। लगभग ढाई लाख योग कक्षाओं के साथ देश भर के 600 जिलों में यह कार्यक्रम चलेंगे। इसके बाद जून माह में फैसला किया जाएगा कि चुनावी राजनीति में किस तरह से उतरा जाए इसके लिए तीन तरह के विकल्प है। पहला यह कि मौजूदा राजनीतिक दलों में ही ऐसे लोगों को तैयार किया जाए जो चुनाव लड़कर चुनकर संसद में आए। दूसरा, इस विचारधारा के समर्थक निर्दलीय तौर पर चुनाव मैदान में उतरें और तीसरा यह कि नया राजनीतिक दल बनाकर चुनाव मैदान में उतरा जाए।

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Murari Sharan Shukla posted in luckhnawi.
मैं उत्पीड़क सत्ता को ललकार रहा हूँ , खूब समझता हूँ मैं खुद ही अपनी मौत पुकार रहा हूँ , मेरे शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी ही , मेरे वर्तन से परिवर्तित कुछ तो परम्परा होगी ही | मैं जो उलटे -सीधे स्वर से गाता रहता करुण कथाएँ, सुनकर अकुलाती ही होगी व्यथितों की चिर मूक व्यथाएँ, मेरे स्वर से कुछ तो मुखरित जगती दुःख भरा होगी ही , मेरे शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी ही || अमर शहीदों के शोणित से रंगी हुई है आज पताका , लहराता मैं चला बदलने इस उत्पीडित जग का खाका , मेरी लोल लहर से प्लावित कुछ तो वसुंधरा होगी ही , मेरी शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी ही , मेरे वर्तन से परिवर्तित कुछ तो परम्परा होगी ही |||
Murari Sharan Shukla14 अप्रैल 13:33
मैं उत्पीड़क सत्ता को ललकार रहा हूँ ,
खूब समझता हूँ मैं खुद ही अपनी मौत पुकार रहा हूँ ,
मेरे शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी ही ,
मेरे वर्तन से परिवर्तित कुछ तो परम्परा होगी ही |
मैं जो उलटे -सीधे स्वर से गाता रहता करुण कथाएँ,
सुनकर अकुलाती ही होगी व्यथितों की चिर मूक व्यथाएँ,
मेरे स्वर से कुछ तो मुखरित जगती दुःख भरा होगी ही ,
मेरे शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी ही ||
अमर शहीदों के शोणित से रंगी हुई है आज पताका ,
लहराता मैं चला बदलने इस उत्पीडित जग का खाका ,
मेरी लोल लहर से प्लावित कुछ तो वसुंधरा होगी ही ,
मेरी शोणित की लाली से कुछ तो लाल धरा होगी ही ,
मेरे वर्तन से परिवर्तित कुछ तो परम्परा होगी ही |||

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अमन देना चमन देना मुझे भारत वतन देना वचन देना मुझे तुम काशी भूमि में जन्म देना मै जब भी मरू मुझ को मिले मणिकर्णिका की पुण्य भूमि मेरा शव जलने से पहले तिरंगे का कफ़न देना-----bharat soni!!!
Bharat Soni14 अप्रैल 09:25
अमन देना चमन देना मुझे भारत वतन देना
वचन देना मुझे तुम काशी भूमि में जन्म देना
मै जब भी मरू मुझ को मिले मणिकर्णिका की पुण्य भूमि
मेरा शव जलने से पहले तिरंगे का कफ़न देना-----bharat soni!!!

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"मेरे हक को तू नकार दे
मेरे हौसले का हिसाब दे
जो फासला था दरमियां
वह आज भी घटा नहीं
तू अगर खुदा है तो खुद्दार मैं भी हूँ
में मजहबों में बंटा नहीं इबादतों से हटा नहीं
तू है देवता तो ये बता ये रास्ता क्यों अजीब है
गुनाह तो मेने नहीं किया फिर ये क्यों मेरा नसीब है
जहान में तू जहां भी है मुझे आज तक
तू दिखा नहीं कभी तू कहीं मिला नहीं
तेरे बिना में कल भी था तेरे बिना में अब भी हूँ
ये वहम था मेरे जहन का जो आज तक मिटा नहीं ." --- राजीव चतुर्वेदी

Friday, April 8, 2011

उम्मीदें जाग गई हैं. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर. अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है.लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है. सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा.जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में भी नहीं पहुँची है.हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब. इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग भी जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे नहीं हो रहे हैं.वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में.मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी अपने आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम.लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी. वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है.भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है.फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ सौ लोग.ब्रिटेन से एक पत्रकार ने पूछा कि दिल्ली में ही एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं और जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं वो तो बहुत ज़्यादा नहीं है, तो क्या अभी लोगों को भ्रष्टाचार अपना मुद्दा नहीं लगता?जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है. सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता.उस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा.ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को.लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है.लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं. लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन.अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं.भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता.बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है.सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी.उस दिन अन्ना हज़ारे का अनशन ख़त्म हो जाएगा. अन्ना हज़ारे रालेगणसिद्धि लौट जाएँगे. पता नहीं इन सवा अरब बेचारों का क्या होगा ?
उम्मीदें जाग गई हैं. सवाल पूछे जा रहे हैं कि क्या हमारे यहाँ भी तहरीर चौक होगा?माहौल पूरा है. थोड़ा दिल्ली के जंतर मंतर पर, थोड़ा इधर-उधर के शहरों में और सबसे ज़्यादा टेलीविज़न के स्क्रीनों पर. अख़बारों ने भी माहौल बनाने की पूरी कोशिश की है.लेकिन जनता अभी थोड़ी दूर से देख रही है. सोच रही है कि शायद हमारे यहाँ भी तहरीर चौक हो जाएगा.जो लोग अन्ना हज़ारे के आमरण अनशन के समर्थन में निकल रहे हैं उनकी संख्या अभी हज़ारों में भी नहीं पहुँची है.हमारी आबादी के नए आंकड़े अभी-अभी आए हैं. एक अरब 21 करोड़ यानी लगभग सवा अरब. इस सवा अरब लोगों में से अभी कुछ हज़ार लोग भी जंतर मंतर या इंडिया गेट पर इकट्ठे नहीं हो रहे हैं.वह कहावत चरितार्थ होती दिख रही है, देश में भगत सिंह और गांधी पैदा तो हों, लेकिन पड़ोसी के घर में.मिस्र की आबादी से तुलना करके देखें, वहाँ की कुल आबादी है आठ करोड़ से भी कम. यानी अपने आंध्र प्रदेश की आबादी से भी कम.लेकिन वहाँ तहरीर चौक पर एकबारगी लाखों-लाखों लोग इकट्ठे होते रहे. उन्हें वहाँ इकट्ठा करने के लिए किसी नेता की ज़रुरत नहीं पड़ी. वे ख़ुद वहाँ आए क्योंकि उन्हें लगा क्योंकि परिवर्तन उनकी अपनी ज़रुरत है.भारत की जनता के लिए अन्ना हज़ारे को आमरण अनशन पर बैठना पड़ा है.फिर भी इकट्ठे हो रहे हैं कुछ सौ लोग.ब्रिटेन से एक पत्रकार ने पूछा कि दिल्ली में ही एक करोड़ से ज़्यादा लोग रहते हैं और जितने लोग इकट्ठे हो रहे हैं वो तो बहुत ज़्यादा नहीं है, तो क्या अभी लोगों को भ्रष्टाचार अपना मुद्दा नहीं लगता?जिस देश में अधिसंख्य जनता सहमत है कि देश में भ्रष्टाचार असहनीय सीमा तक जा पहुँचा है. सब कह रहे हैं कि नौकरशाहों से लेकर राजनेता तक और यहाँ तक न्यायाधीश तक भ्रष्टाचार में लिप्त हैं. हर कोई हामी भर रहा है कि इन राजनेताओं को देश की चिंता नहीं.भ्रष्टाचार के आंकड़ों में अब इतने शून्य लगने लगे हैं कि उतनी राशि का सपना भी इस देश के आम व्यक्ति को नहीं आता.उस देश में जनता इंतज़ार कर रही है कि इससे निपटने की पहल कोई और करेगा.ख़ुद अन्ना हज़ारे कह रहे हैं कि जितना भी समर्थन मिल रहा है, उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी. वह तो मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी को भी नहीं थी और न विपक्षी दलों को.लेकिन जितने भी लोग निकल आए हैं उसने लोगों को जयप्रकाश नारायण से लेकर विश्वनाथ प्रताप सिंह की याद दिला दी है.लोग तहरीर चौक को याद कर रहे हैं, बिना ये समझे कि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी थीं. लेकिन वे मानने लगे हैं कि तहरीर चौक यानी परिवर्तन.अन्ना हज़ारे ने एक लहर ज़रुर पैदा की है. लेकिन अभी लोग उन लहरों पर अपनी नावें निकालने को तैयार नहीं हैं.भारत का उच्च वर्ग तो वैसे भी घर से नहीं निकलता. ज़्यादातर वह वोट भी नहीं देता. ग़रीब तबका इतना ग़रीब है कि वह अपनी रोज़ी रोटी का जुगाड़ एक दिन के लिए भी नहीं छोड़ सकता.बचा मध्य वर्ग. भारत का सबसे बड़ा वर्ग. और वह धीरे-धीरे इतना तटस्थ हो गया है कि डर लगने लगा है.सरकार के रवैये से दिख रहा है कि वह देर-सबेर, थोड़ा जोड़-घटाकर लोकपाल विधेयक तैयार करने में अन्ना हज़ारे एंड कंपनी की भूमिका स्वीकार कर लेगी.उस दिन अन्ना हज़ारे का अनशन ख़त्म हो जाएगा. अन्ना हज़ारे रालेगणसिद्धि लौट जाएँगे. पता नहीं इन सवा अरब बेचारों का क्या होगा ?

अगर चैन से सोना है तो जाग जाओ

अगर चैन से सोना है तो जाग जाओ

प्रियवर ,
न तो मैं अरुंधती के लेखन का समर्थक हूँ और न ही सरकार के तथा सरकारी भ्रष्ठाचार के विरुद्ध होने वाले आन्दोलनों का विरोधी !
हाँ गरीव और निर्दोष लोगों के मारे जाने या उनके विरुद्ध किसी भी अतिवादी कार्यवाही का प्रवल विरोधी हूँ ………….
ठीक वैसे ही विधायिका कार्यपालिका और न्यायपालिका द्वारा देश के ९५ % लोगों के शोषण का भी प्रवल विरोधी हूँ !
परन्तु एक बात सदा ही विचारणीय होनी चाहिए की यदि जनता द्वारा चुनी गयी जनाकल्यानकारी सरकारें अपना दायित्व भूलकर आकंठ जन-शोषण मैं लिप्त हो जाएँ और लगातार सुधरने से मुकरती चली जाय तो क्या किया जाना चाहिए ?///
ये एक यक्ष प्रश्न है !
प्रत्येक व्यक्ति की सोच निश्चित अलग -अलग होगी ही —————-
ऐसे मैं /////////////
यहाँ एक प्रश्न प्रासंगिक है !
क्या वास्तव मैं आज़ादी केवल गाँधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन से ही मिली थी ??????
क्या उग्र और सशत्र आन्दोलनवादी सुभाष , चंद्रशेखर , आजाद विस्मिल ,की कोई भूमिका नहीं थी ???????????
आज —–
मुझे कोई गुरेज़ नहीं यदि आप अरुंधती को कोसते है या फिर नक्सलवाद को या किसी भी हिंसक आन्दोलन को !………..
परन्तु हर सिक्के के निश्चित रूप से दो ही पहलू होते है ————
दूसरे पहलू को देखे बिना सिक्के का मूल्याङ्कन नहीं किया जा सकता है …………….
निश्चित ही आपको सिक्के का दूसरा पहलू यानि सरकार की काली करतूतें या तो दिखाई नहीं देती या फिर आप उनके सहयोगी और समर्थक हैं ++++++++++++
मैं मानता हूँ की सिक्के के दोनों पहलू सामान्यतया एक साथ नहीं देखे जा सकते है ,,,
परन्तु ………..
यदि सिक्के को लेकर दर्पण के सामने खड़े हो जाएँ तो एक ही द्रष्टि पटल से दोनों पहलू का सम्यकाव्लोकन किया जा सकता है !
अस्तु,
हमें हर प्रबुद्ध लेखन से यह आशा करनी ही चाहिए की वे किसी एक पक्ष की आलोचना करने की अपेक्षा दोनों पक्षों की समालोचना करें जिससे लोग उस पक्ष को पहचान सकें जो वास्तव मै दोषी है और सारी समस्याओं की जड़ हैं
मैं किसी भी अतिवादी कार्यवाही का प्रवल विरोधी हूँ
,परन्तु—-
यदि पैर में कांटा लग जाय और गहरे तक जाकर टूट जाय तो-
दो रास्ते हैं ——-
(१) बाह्य औषधीय उपचार जैसे गुड और तम्बाकू का लेप करें या megsulf ointment की पट्टी करें !!! फिर लम्बी प्रतीक्षा करें ! इश्वर से प्रार्थना करें !! या,////////////////
(२) एक कीटानुरहित सुई लेकर(या अन्य किसी शल्य चिकित्सा उपकरण से ) तत्काल कांटे को निकाल बाहर करें बाद मैं कोशिकाओं को हुई क्षति को औषधीय उपचार से ठीक करें !
दोनों ही उपचार अपने आप मैं पूर्ण एवं प्रचलित एवं तर्कसंगत हैं!
अब ये व्यक्ति के व्यक्तित्व तथा देश-काल-परिस्थिति पर निर्भर करता हैं की कोनसा रास्ता स्वीकार करता है !
इसलिए -
मेरी दृष्टि मैं प्रथम-जिम्मेदार वो है जो परिस्थिति पैदा करता है !
“यथा राजा तथा प्रजा ”
आज आपको आतंकवाद नक्सलवाद ,पूंजीवाद ,रिश्वतखोरी ,दुराचार ,भ्रष्टाचार ,अनाचार आदि जितने भी दुष्कर्मों का महावृक्ष देश में दिखाई देता है!
उसकी जड़ें कहाँ हैं ????????????
सिर्फ और सिर्फ ———–
संसद और विधान सभाओं मैं
विधायिका / कार्यपालिका के आदेशों के अनुपालन मैं सबसे निचला पायदान –पुलिस या कलेक्ट्रेट या निम्न तम न्यायालय…..क्या होता है यहाँ आप सब जानते हैं ——-
सिर्फ एक उदहारण ही देता हूँ ——-
आपने देखा होगा पुलिस का आदर्शवाक्य क्या है ?
“परित्त्रानाय साधुनाम , विनाशाय च दुश्क्रताम”
परन्तु वास्तविकता इसके ठीक विपरीत है —-
“”परित्त्रनाय दुष्टानाम, विनाशाय च साधुनाम “”
एक पुलिस ठाणे का द्रश्य देखें —
एक गरीव अपनी बेटी की अस्मत लूटने की फरियाद लेकर पहुंचा ——–संतरी ने घुड़क कर भगा दिया —– कुछ है तो निकाल —रुपये ऐंठे —अन्दर धकेल दिया -मुन्सी ने पूछा क्या है रे— चले आते है कुछ काम धाम है नहीं आ गए रिपोर्ट लिखाने ——-ला निकाल —पैसे लिए —-चल बोल क्या हुआ ——पीड़ित ने बोला कुछ –मुन्सी ने लिखा कुछ , —-दरोगा जी ने क्लास लगा दी — स्साले तुमको कुछ काम धाम नई है, इज्जतदार आदमी के खिलाफ आरोप लगाता है तेरी लोंडिया ही उसके घर गई होगी—–रात को आऊंगा तफ्तीश करने —– चल भाग ——ज़बरदस्ती निकाल बाहर किया !
दूसरा द्रश्य ———
इलाके का जाना माना गुंडा / विधायक जी का गुर्गा /ब्लाक प्रमुख का साला ठाणे मै दाखिल हुआ– संतरी ने सेल्यूट मारा —हेड मोहर्रिर ने झुक कर स्वागत किया —-थानाध्यक्ष ने खड़े होकर हाथ मिलाया —पूछा कहिये नेताजी कैसे आना हुआ —-फोन कर दिया होता मैं खुद ही आ जाता ———नेताजी ने कान मै कुछ कहा ——-एक थेलेमैं कुछ सामान दिया —-दरोगा जी एक दम सतर्क हो गए —आप चिंता न करें आज ही स्साले का इंतजाम कर दूंगा !
तीसरा द्रश्य -
दो सिपाही उसी गरीव को पीटते हुए घसीटते हुए ला रहे हैं स्साला चोरी करता है वो भी नेता जी के घर मैं —–ऊपर से अपनी बदचलन लोंडिया के साथ बलात्कार की बात करता है ——–चल साले जिंदगी भर जेल मै चक्की पीसना —- उठा कर चोरी के इल्जाम मैं बंद कर दिया —-नेता जी के द्वारा दिया हतियार बरामद दिखा दिया —-नेता जी के द्वारा दिया गया अन्य सामान भी उसके पास से बरामद दिखा दिया ………………
विद्वान् न्यायाधीश ने कानून की अंधी देवी की मूर्ति के सामने और गाँधी जी फोटो के नीचे सब कुछ जानने के बाद भी —-गवाह और सुबूतों की रोशनी मै १० वर्ष की कैदे-बा-मुशक्कत निर्धारित कर दी!
—लडके के ऊपर आर्थिक संकट के साथ साथ नेता जी के गुर्गों का कहर टूटा ……..
—लड़की ने आत्म हत्या करली ………..
__लड़का बागी हो गया —ऐसे ही सताए हुए कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर —एक सिपाही को दारु पिलाकर उसी की बन्दूक से ठंडा कर दिया —नेताजी की लड़की के साथ दुष्कर्म किया ——तीन सदस्यों को मौत की नीद सुला दिया —–दरोगा जी के पैत्रक गाँव मैं जाकर बेटे सहित गोली से उड़ा दिया !
—चम्बल के बागिओं ने हाथों हाथ लिया —और बना दिया — कुख्यात आतंकी, डकैत , —-फिरौती वसूलने वाला …………
बाद मैं…………..
तमाम लोगों के खून से रंगे हाथ ——— लेकिन वे सभी नेता गुंडे ,पुलिस वाले ,पैसे वाले, व्यापारी या शोषक वर्ग के लोग ही नहीं थे —उनमें कुछ उस वर्ग के लोग भी थे जिनका वह स्वयं प्रतिनिधित्व करता है —– उसके अनुसार सब कुछ जायज —-सबकुछ परिस्थिजन्य——
—जब कानून और कानून के रक्षक पीड़ित की पीड़ा को दूर नहीं करते वल्कि जानबूझ कर विपरीत-कर्मी बन जाते हैं , तो……….
दो ही प्रतिक्रिया होती हैं …………
(१)———- (कांटा निकालने के लिए-गुड-तम्बाकू या औषधि के लेप की तरह ) शोषक वर्ग के झूठे आश्वाशनों का मरहम लगाकर –इश्वाराधीन होकर भगवत्चिन्तन करे अपना अमूल्य समय , कठोर मेहनत से कमाया हुआ धन मुकदमे में खर्च करे और (भोपाल गैस पीड़ितों की तरह ) २५ साल बाद —बहुत हुआ तो —२५ महीनों का दंड ! —— संभवतः देश मै ९९.९९ % लोग इसे ही अपनाते है ! उनकी मजबूरी है
(२)—-दूसरा वही जो ऊपर आप पढ़ चुके हैं
.
इस आदमी से अगर आप मिलेंगे और उसकी वास्तविक व्यथा कथा सुनेंगे तो क्या प्रतिक्रिया देंगे ???????????????
मैं इस व्यक्ति की अतिवादी प्रतिक्रिया का व्यक्त रूप मैं न सही ह्रदय से समर्थन करता हूँ !
–अब आप मुझे अरुंधती की तरह कोसेंगे !.
– जरूर कोसिये………
–लेकिन ………….
–मुझे कोसने से पहले ……….
–अरुंधती को कोसने से पहले ………..
–अन्य ऐसे ही किसी लेखक को कोसने से पहले ………
–प्रतिक्रियावादियों को कोसने से पहले……….
–इन परिस्थितियों को पैदा करने वालों का समर्थन जरूर कीजिए !
—संसद और विधायिकाओं मैं बैठे दुराचारी अत्याचारी बलात्कारी देश के गरीबों के लुटेरे (जिनकी संपत्ति स्विस बेंकों मैं जमा हैं ) नेता लोगों की जयजयकार ज़रूर कीजिये !
मैं जानता हूँ …………नहीं कर पाएंगे आप !!
इसलिए …………..
अच्छा होगा यदि समय रहते जाग जाएँ !
सादर
Dr.Acharya

Thursday, April 7, 2011

आप जानते हैं, नवरात्रि पर घर में जौ (जवारे) क्यों लगाना चाहिए















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Sanjay Pracharak


आप जानते हैं, नवरात्रि पर घर में जौ (जवारे) क्यों लगाना चाहिए!

Source: धर्मडेस्क. उज्जैन | Last Updated 10:06 AM [IST](06/04/2011)

चैत्र प्रतिपदा से हिन्दू नववर्ष के प्रारंभ के साथ ही बड़े नवरात्र भी शुरू होते हैं। ये नौ दिन माता की आराधना के लिए महत्वपूर्ण माने जाते हैं। नवरात्रि में देवी की उपासना से जुड़ी अनेक मान्यताएं हैं उन्ही में से एक है नवरात्रि पर घर में जवारे या जौ लगाने की। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इसके पीछे कारण क्या है?

दरअसल नवरात्रि में जवारे इसलिए लगाते हैं क्योंकि मान्यता है कि जब सृष्टी की शुरूआत हुई थी तो पहली फसल जौ ही थी। इसलिए इसे पूर्ण फसल कहा जाता है। यह हवन में देवी-देवताओं को चढ़ाई जाती है यही कारण है कि इसे हविष्य अन्न भी कहा जाता है। वसंत ऋतु की पहली फसल जौ ही होती है। जिसे हम माताजी को अर्पित करते हैं।

कहा जाता है जौ उगाने से भी भविष्य से संबंधित भी कुछ बातों के संकेत मिलते हैं जैसे यदि जौ तेजी से बढ़ते हैं तो घर में सुख-समृद्धि तेजी से बढ़ती है। अगर जौ हल्के रंग के हों तो भविष्य में घर की समृद्धि में किसी तरह की वृद्धि होती है और यदि ये जौ मुरझाए हुए या इनकी वृद्धि कम हुई हो तो भविष्य में कुछ अशुभ घटना का संकेत मिलता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार जौ से ही चावल उत्पन्न हुए हैं। लेकिन इस मान्यता के पीछे मूल भावना यही है कि माताजी के आर्शीवाद से पूरा घर वर्षभर धनधान्य से भरा रहे।

भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चल पड़ी है।

देश भर में भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहीम चल पड़ी है। इस बार भ्रष्टाचार के
खिलाफ मुहीम सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीविओं का एक बड़ा वर्ग चला
रहा है। सुप्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे ने भी भ्रष्टाचार से लड़ने के
लिए गांधीवादी तरीके से आमरण अनशन की शुरूआत की है, और आश्चर्य इस बात
का है कि देश -विदेश में इमानदार प्रधानमंत्री के रूप में पहचाने वाले
मनमोहन सिंह ने अन्ना हजारे से अपील की है कि वो इस मुद्दे पर आमरण अनशन
ना करें। क्या इसका अर्थ यह लगाया जाना चाहिये कि देश के प्रधानमंत्री
नहीं चाहते कि भ्रष्टाचार भारत में मुद्दा बनें, और यह भी कि वे कौन लोग
हैं जिनको भ्रष्टाचार के मुद्दा बन जाने से अपने अस्तित्व पर संकट खड़ा
होता नजर आ रहा है?
दरअसल, आजादी के बाद से ही शासन व्यवस्था को संभालने वाले अंग्रेंजों के
हिन्दुस्तानी उत्तराधिकारियों ने भारत की जनता को शासक और शासित की
मानसिकता से ही देखा और सत्ता का इस्तेमाल अपनी विपन्नता को सम्पन्नता
में बदलने के लिए एक हथियार के रूप में किया। इन राजनेताओं ने स्वाधीनता
सैनानियों के संघर्षो और बलिदानों के साथ ना केवल विश्वासघात किया
अपितु भारत की उस बेबस जनता के विश्वास को भी छला जो इनसे आत्मगौरव और
स्वाभिमान से युक्त भारत की संकल्पना सजाए बैठे थे। आज हालात यह हैं कि
ये राजनेता सत्ता की प्राप्ति के लिए देश के मतदाताओं को ही खरीदने का
दुस्साहस करने लगे हैं। अभी जिन पांच राज्यों में विधानसभा के चुनाव हो
रहे हैं, वहां के राजनीतिक दल शराब से लेकर टी वी फ्रिज तक देकर वोटों
को खरीदने का ना केवल दुस्साहस कर रहे हैं अपितु अपने इस अपराध में एक
हद तक वे सफल भी हो रहे हैं।
इसी कारण पिछले कई सालों से भारत की प्रशासनिक एवं राजनीतिक व्यवस्था को
भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी है और भ्रष्टाचार के विरूद्ध आम आदमी में ना
केवल गहरी पीड़ा है, अपितु वह मन से आहत भी है। आजादी के बाद बनी पहली
सरकार में ही भ्रष्टाचार की बू आने लग गई थी, लेकिन भ्रष्टाचार के
खिलाफ तब के राजनेताओं की चुप्पी और अनदेखी ने हालात को इतना बिगाड़ दिया
कि आज पूरा देश भ्रष्टाचारियों से संत्रस्त है। किसी को यह विश्वास नहीं
है कि भारत का प्रशासनिक, न्यायिक और राजनीतिक तंत्र भ्रष्टाचार से
मुक्ती की अभिलाषा भी रखता है और इस अविश्वास के पीछे एक ठोस कारण भी है
कि भारत की सरकारें आज तक यह सुनिश्चित नहीं कर पाई हैं कि
भ्रष्टाचाररियों के लिए सत्ता के प्रतिष्ठानों में कोई भी स्थान नहीं
है।
२०१० में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक सर्वे हुआ, ट्रांसपिरेसीं
इन्टरनेशनल द्वारा विश्व के १७८ देशो में किये गये इस सर्वे में भारत
को ८७ वें स्थान पर पाया गया और इसी संस्था ने यह भी दावा किया कि भारत
विश्व के भ्रष्टतम देशो में से एक है। यहां तक कि दक्षिणी एशियाई देशो
में भी भारत अपने पड़ोसी देशो (पाकिस्तान -143, बंगलादेश -134,
नेपाल-146 और श्रीलंका – 92) से भ्रष्टाचार में बहुत आगे है। विश्व के
सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक तथ्य और क्या हो सकता
है।
एक अन्य अंतर्राष्ट्रीय संस्थान इन्टरनेशनल वाच डाग ने अपने अध्ययन में
यह पाया है कि 1948 से 2008 तक के 60 सालों में 462 बिलीयन डालर यानी 20
लाख करोड़ से ज्यादा रूपये गैर कानूनी तरीके से भारत के बाहर ले जाए गए।
यह राशि भारत के सकल घरेलु उत्पाद का 40 प्रतिशत है। और जिस 2 जी घोटाले
को लेकर उच्चतम न्यायालय ने सरकार की नकेल कस रखी है, उससे यह राशि 12
गुना अधिक है। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष में आर्थिक विशेषज्ञ रहे श्री
देव कार के अनुसार 11.5 प्रतिशत की दर से हमारे खून पसीने की कमाई को
विदेशी बैंकों में जमा किया जा रहा है। तभी तो स्विस बैंक यह कहते हैं
1456 बिलियन डालर के साथ भारतीयों की
सर्वाधिक मुद्रा उनके बैंकों में जमा है। यह धन भारत पर कर्जे का 13गुना
है। इन सब तथ्यों में महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विदेशी बैंकों में जमा
इस काले धन का 50 प्रतिशत हिस्सा 1991 में लागू किये गए आर्थिक सुधारों
के बाद ही इन बैंकों में पहुंचा, और यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं
है कि हमारे वर्तमान इमानदार प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह ही उस समय
वित्त मंत्री के रूप में भारत को अंतर्राष्ट्रीय बाजार बना रहे थे।
देश के प्रति अपराधों की श्रृंखला सिर्फ यहां ही नहीं थम रही है,
पीढ़ियों से सत्ता पर काबिज राजनीतिक परिवारों में से एक गांधी परिवार,
तमिलनाडू के करूणानिधि या जयललिता, आंध्रप्रदेश के चंद्र बाबू नायडू या
स्व. मुख्यमंत्री वाइ एस आर रेड्डी, कर्णाटक के मुख्यमंत्री एस
येडडूरप्पा, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान खाद्य मंत्री
शरद पवार, उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती, पूर्व मुख्यमंत्री व
घोषित समाजवादी मुलायम सिंह और लालू यादव, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश
सिंह बादल और जम्मू कश्मीर का अब्दुल्ला परिवार ऐसे राजनीतिक परिवारों
के रूप में उभरे हैं, जिनकी काली कमाइयो के चर्चे उनके ही दलों के
राजनीतिक कार्यकर्ता बड़े ही दंभ के साथ करते हैं, और भारत के लोकतंत्र
की यह मजबूरी है कि बिना इन राजनीतिक दलों के सहयोग और सत्ता बंटवारे के
कोई भी राजनीतिक दल सरकारें नहीं बना सकता। चाहे वो बोफोर्स खरीदने के
मामले में राजीव गांधी को चुनौती देने वाले स्व० विश्वनाथ प्रताप सिंह
हों या देश के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी।
यह भ्रष्टाचार ही तो है कि आजादी के बाद से खरबों रूपये खर्च होने के
बावजूद भारत के ग्राम अपनी किस्मत और बदहाली को बदल नहीं पाये हैं। वे
पेयजल, सड़क, विद्यालय और चिकित्सालय जैसी आधारभूत सुविधाओं से भी वंचित
हैं। देश के विकास में अपना श्रम पसीने की तरह बहा देने वाले मजदूर और
किसान बी पी एल कार्ड में नाम लिखवाने के लिए संघर्षरत हैं। मध्यभारत
के वनवासियों को विदेशी शक्तियां बंदूकें देकर भारत में ही आंतरिक
संघर्षो को बढ़ावा दे रही हैं।
तो आज जब भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का आगाज हो रहा है, तो यह भारत की
उसके विदेशी शत्रुओं से लड़ाई नहीं है, यह भारत का भारत के प्रति संघर्ष
है। जहां अमीरों की संख्या जिस गति से बढ़ रही है, उतनी ही गति से किसान
आत्महत्या कर रहे हैं, देश के 40 करोड़ लोगों को दो समय का निवाला नहीं
मिल रहा है, विद्यालयों में जाने वाले छात्रों का प्रतिशत घट रहा है।
भारत का प्रतिनिधित्व ऐसे लोगों के हाथों में है जिनके बदन भले ही मंहगी
सिल्क के कपड़ों से ढ़के हैं, और उनकी सूरत समृद्ध भारत की चमक तो देती है,
पर सीरत से वे ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जो बाजार है और यहां पर
वही जीवित बचेगा, जिसके पास पैसे हैं चाहे वह हसन अली हो या गांधी
परिवार।

सुरेन्द्र चतुर्वेदी
(लेखक सेंटर फार मीडिया रिसर्च एंड डवलपमेंट के निदेशक हैं।)
" हम कोलंबस हैं हमारे हाथों में भूगोल की किताबें नहीं होतीं,
हमारी निगाहों में स्कूल की कतारें नहीं होती,
हमारे घर से लाता नहीं टिफिन कोई,
तुम्हारी तरह हमको पिता दिशा नहीं समझाता,
तुम्हारी तरह हमें तैरना नहीं सिखलाता,
हमारे घर पर इंतज़ार करती माएं नहीं होती.

हम कोलंबस हैं हमारे हाथ में होती हैं पतवारें,
हमारी निगाह में रहती हैं नाव की कतारें,
हमारे पिता ने निगाह दी तारों से दिशा पहचानो,
हमारे पिता ने समझाया तूफानों की जिदें मत मानो,
हमारी मां यादों में बस सुबकती है आंसू से रोटी खाती है,
स्कूलों की छुट्टी के वख्त हमारी मां भी समंदर तक आके लौट जाती है,
मेरी मां जानती है में कभी न आऊँगा फिर भी मेरी सालगिरह मनाती है.

तुम किनारे चले जज़बात हो, जरूरत, सियासत या साहिल कोई ,
हम में था लहरों से टकराने का दम, आर पार का दाव लगाने का जज्वा कोई
तुम्हारे हाथ में भूगोल की किताब है पढो मुझको
मुझको है मां से बिछुड़ जाने का गम . "

Jai mata di


Jai mata di dosto _/\_

जानिए, क्या है जन लोकपाल बिल?

नई दिल्ली।

देश में गहरी जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार को रोकने के लिए जन लोकपाल बिल लाने की मांग करते हुए अन्ना हजारे ने मंगलवार को आमरण अनशन शुरू कर दिया। जंतर – मंतर पर सामाजिक कार्यकर्ता हजारे को सपोर्ट करने हजारों लोग जुटे। आइए जानते हैं जन लोकपाल बिल के बारे में…

- इस कानून के तहत केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्त का गठन होगा।

- यह संस्था इलेक्शन कमिशन और सुप्रीम कोर्ट की तरह सरकार से स्वतंत्र होगी।

- किसी भी मुकदमे की जांच एक साल के भीतर पूरी होगी। ट्रायल अगले एक साल में पूरा होगा

- भ्रष्ट नेता, अधिकारी या जज को 2 साल के भीतर जेल भेजा जाएगा।

- भ्रष्टाचार की वजह से सरकार को जो नुकसान हुआ है अपराध साबित होने पर उसे दोषी से वसूला जाएगा।

- अगर किसी नागरिक का काम तय समय में नहीं होता तो लोकपाल दोषी अफसर पर जुर्माना लगाएगा जो शिकायतकर्ता को मुआवजे के तौर पर मिलेगा।

- लोकपाल के सदस्यों का चयन जज, नागरिक और संवैधानिक संस्थाएं मिलकर करेंगी। नेताओं का कोई हस्तक्षेप नहीं होगा।

- लोकपाल/ लोक आयुक्तों का काम पूरी तरह पारदर्शी होगा। लोकपाल के किसी भी कर्मचारी के खिलाफ शिकायत आने पर उसकी जांच 2 महीने में पूरी कर उसे बर्खास्त कर दिया जाएगा।

- सीवीसी, विजिलेंस विभाग और सीबीआई के ऐंटि-करप्शन विभाग का लोकपाल में विलय हो जाएगा।

- लोकपाल को किसी जज

, नेता या अफसर के खिलाफ जांच करने और मुकदमा चलाने के लिए पूरी शक्ति और व्यवस्था होगी।

-जस्टिस संतोष हेगड़े, प्रशांत भूषण, सामाजिक कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल ने यह बिल जनता के साथ विचार विमर्श के बाद तैयार किया है।

(नवभारत टाइम्‍स से साभार)

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