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Dy.Commissiner VII UP SJAB Lucknow (India)

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Thursday, December 29, 2011

साभार

सुना है ...
" सुना है वर्फ की चादर फ़ैली है पहाड़ों पर
सुना है ओस की वारिस हुई है देवदारों पर
सुना है सर्द है सूरज सुबह छुप गयी है कोहरे की रजाई में

सुना है सत्य के संकेत सीमित हैं बयानों तक
सुना है प्यार भी बिकने लगा है अब दुकानों पर
सुना है सड़कें रोनक हैं अँधेरे हैं मकानों पर
सुना है रात है गहरी कातिल बैठे हैं मचानो पर
सुना है इस सदी में न्याय की देवी की आँखें बंद हैं
सुना है मन्थराएं मंत्रणाएं कर रही हैं
सुना है स्वान के स्कूल में अब शेरों को पढ़ना है
सुना है शातिरों को शब्दकोषों पर भरोसा है
सुना है एक बूढ़े बाप ने दहेज़ जोड़ा है
सुना है दहेजखोर दामाद ने रिश्तों को निचोड़ा है

सुना है हमको खुदा से प्यार कम पर खौफ ज्यादा है


सुना है कोहरे में दिया दयनीय सा दिखने लगा है
सुना है पिता पर पैसा कम है पर प्यार ज्यादा है

सुना है मां की ममता खिलौनों की दुकानों से डरती है

सुना है एक मछली प्यासी हो कर पानी में ही मरती है
सुना है जिन्दगी जज़बात में सिमिटी है
सुना है एक तितली फूल के दामन से लिपटी है." -- राजी

साभार

"खामोश सी दिखती खला को खंगालो तो कोई ख्वाब दिखे
ख्वाब की तासीर पहचानो तो कुछ बात बने

रूह जब जागती और देह सोती हो जहाँ
ख्वाब खामोशी से उनवान लिखा करते हैं
देह वह पुल है जिसके ऊपर तारों से चमकते हैं ख्वाब
और इस पुल के नीचे बहुत दूर तलक
जिन्दगी दरिया सी बहा करती है
तुमने जाजवात के जख्मों को संजोया तो समझलो इतना
ख्वाब जब रूह से मिलते हैं तो इह्लाम हुआ करते हैं
ख्वाब जब देह से मिलते हैं तो इल्जाम हुआ करते हैं
ख्वाब जब आँख में हों तो आंसू बन कर अपने अहसास को अकेले में नमी दिया करते हैं
ख्वाब गर हों तेरी आँख में तो सहेजो इनको
ख्वाब में दर्ज हैं ख्वाहिश की इबारत यारो
हकीकत जब हाशिये पर हो, हसरतें हांफती हों
ख्वाब में खोजो कोई उनवान पढो
ख्वाब की तासीर पहचानो तो कुछ बात बने
जिन्दगी हर ख्वाब की ख्वाहिश ही हुआ करती है ."
---- रा. च.

Wednesday, December 28, 2011


"कुछ ने रिश्तों को कुछ नाम दिया
कुछ ने रिश्तों को बदनाम किया
हम तो रास्तों के मुसाफिर थे रिश्ते बनाते तो बनाते कैसे ?"

Monday, December 26, 2011

ये मसाइले तसव्वुफ़ ये तेरा बयान गालिब

तुम हम बलि समझते जो न बादाख्‍खार होता

ईश्‍वरीय प्रेम की ये अदभुत बातें , कि वेद ईर्ष्‍या करें।

ये मसाइले-तसव्वुफ़.....

सूफियाना बातें। ये मस्‍ती की बातें।

ये तेरा बयान ग़ालिब

और तेरा कहने का यह अनूठा ढंग, कि उपनिषाद शर्मा जाएं।

पहले घर के भेदियो के सर उडाये जायेंगे..

सांप आस्तीनों के न जब तक मारे जायेंगे..
हौंसला कितना भी हो हम जंग हारे जायेंगे..
दुश्मनों की मारकाट तो बाद में होगी..
पहले घर के भेदियो के सर उडाये जायेंगे..

मुल्ला अग्निवेश कल जामा मस्जिद दिल्ली में एक सभा में गया था , कथित बाबरी मस्जिद को दुबारा बनाने की माग हो रही थी, जिसमे अग्निवेश ने भी बोला की आडवानी और मुरली जोशी को तुरंत गिरफ्तार करना चाहिए और दुबारा से कथित बाबरी मस्जिद को बनाना चाहिए ! अग्निवेश ने संघ और बजरंग दल को बैन करने की भी मांग की है ! अग्निवेश ने बोला की ..क्या साबुत है आडवानी के पास की राम का जन्म स्थान यही पर है ! इस मौके पर उसके साथ जामा मस्जिद के इमाम और इलाके के विधायक शोइब इकबाल भी साथ में था ! अब बहुत हो गया, इस अग्निवेश को कुछ करना पड़ेगा ! महंत नित्यान्नद जी ने एक बार इसको धोया था लगता है की अब ये भूल गया है उस धुलाई को ! सब से पहले इसका भगवा वस्त्र उतरना पड़ेगा !
जय श्री राम जय भारत !!

देशद्रोही की कुछ तस्वीरें...




किताबो के पन्ने पलट के सोचता हूँ
यू पलट जाय मेरी जिंदगी तो क्या बात है
ख्वाबों में जो रोज मिलते है
जो हकीकत में आये तो क्या बात है
कुछ मतलब के लिए ढूढ़ते है सब मुझको
बिन मतलब जो आये तो क्या बात है
कत्ल करके तो सब ले जायेंगे दिल मेरा
कोई बातो से ले जाये तो क्या बात है
जो शरीफों की शराफत में बात न हो
एक शराबी कह जाये तो क्या बात है
अपने रहने तक तो ख़ुशी दूंगा सबको
जो किसी को मौत पे ख़ुशी दे जाये तो क्या बात है

सिक्किम भूकंप राहत कार्यक्रम |

सिक्किम भूकंप राहत कार्यक्रम के अंतर्गत राहत सामग्री वितरण हेतु ले जाते हुए |
सिक्किम रेड क्रास कार्यालय में
ज्वाइंट सेक्रेटरी के साथ भूकंप
पीड़ितों को राहत सामग्री वितरण
पर चर्चा करते हुए |
डा.एल एस आचार्य
डिप्टी कमिश्नर,
७ वीं वाहिनी, एस.जे.ए.बी. लखनऊ
"सवाल यह नहीं है कि अन्ना RSS के
एजेंट हैं या सोनिया CIA की या दिग्विजय किसके दलाल हो कर मालामाल हैं या
प्रणब मुखर्जी किसकी बदौलत गोलमाल हैं. सभी जानते हैं कि मन मोहन सिंह को
हमने नहीं चुना फिर भी वह फर्जी पता दर्ज करवा कर अमेरिका के एजेंट बन कर
देश के प्रधान मंत्री हैं. सभी जानते हैं इधर शिखंडी और उधर पाखंडी हैं.
टीम आन्ना की NGO मार्का टीम में स्वनामधन्य परजीवी फंडभक्षी हैं जिसमें
त्रेता के खर-दूषण जैसे प्रतिभा संपन्न प्रशांत भूषण हैं, किरण बेदी हैं,
सुल्तानपुर में कोलेजों को अनुदान दिलाने के नाम पर मोटी रकम डकार चुके संजय सिंह हैं, कुछ पाखंडी और शिखंडी कवि हैं
तो
दूसरी ओर आसान किश्तों में तिहाड़ जेल जाता मनमोहन मंत्रीमंडल. सवाल यह भी
है कि टीम अन्ना हो या राम देव इन्हें सोनिया भ्रष्ट दिखती हैं मायाबती
ईमानदार ? पर अभी इन सवालों में नहीं उलझिए अभी तो सवाल है भ्रष्टाचार के
अचार से कैसे निपटने का कारगर नुश्खा तैयार हो और देश का विदेश में जा चुका
काला धन कैसे वापस आये. सोनिया -मनमोहन ने देश को दीवालिया बना दिया है.
प्रणव मुखर्जी कहते हैं कि अगर काला धन वालों के नाम उजागर हो गए तो दुनिया
के तमाम देश हमसे नाराज़ हो जायेंगे. सवाल यह भी है कि इनकी देश की जनता के
प्रति जवाबदेही है या अन्य देशों के प्रति ?
बहकावे
में मत आओ !! मत भूले कि भ्रष्टाचार से लड़ने का समय आ चुका है और इसके लिए
अन्ना एक कारगर औज़ार हैं. भ्रष्टाचार से जूझती जनता के लिए दधीची हैं
अन्ना. भ्रष्टाचार के शिखर पर बैठी इस सोनिया -मनमोहन सरकार की जवाबदेही
पहले है.

न इधर उधर की तू बात कर
ये बता कि कारवाँ क्यों लुटा
मुझे रहजनो से गिला नहीं
तेरी रहबरी का सवाल है."

Friday, August 12, 2011

Raksha Bandhan

Raksha Bandhan
Around mid-August, on Shravan Purnima, Hindus all over celebrate Raksha Bandhan. "Raksha" means protection, "bandhan" means bound or binding.
The festival is also known as Balev.

Scriptural Origin

  • The Bhavishya Puran cites a story that the devas once battled with the danavas (demons) for twelve years. However, the devas lost, including the mighty Indra. So they prepared to fight again. On this occasion, Indrani tied a raksha on her consort Indra, after extolling Raksha Bandhan's glory. Indra then attained victory.
  • During the battle of Mahabharat, Queen Kunti tied a raksha on her grandson Abhimanyu to protect him in battle.
  • When the demon King Bali's devotion won over Lord Narayan, he was compelled to leave his abode, Vaikunth, to stay in Bali's kingdom in Sutal. When Lord Narayan failed to return, his distressed consort Lakshmi arrived in Sutal on Shravan Purnima. She accepted Bali as her brother by tying a raksha on him. In return, Bali asked her to wish for a boon. She requested Narayan's return. She grieved that despite having a consort she was experiencing premature widowhood in Narayan's absence. However, the Lord had pledged to eternally protect Bali, by guarding his door. To resolve his dilemma, Brahma and Shiva agreed to guard Bali for four months each, while Vishnu (Narayan) would guard him for the auspicious four months - Chaturmaas - beginning from Ashadh Sud Ekadashi and terminating on Kartik Sud Ekadashi, usually from Mid-July to Mid-November. The festival of Raksha Bandhan commenced when Lakshmiji tied the 'rakhadi' ('rakhee' in Hindi) on Bali Raja. Since Bali Raja offered devotion by sacrificing everything to the Lord, the day is also known as 'Bali-eva' or 'Baleva' for short. Therefore when Brahmin priests perform puja rituals, they chant a famous mantra while tying the 'nada chhadi' (raksha) on a devotee:
    Yena baddho Baliraja daanavendro Mahaabala,
    tena twaamabhi badh naami rakshe maa chala maa chala
    i.e. I tie on you (the devotee) the raksha which was tied on Bali, the King of demons. Therefore O Raksha! Do not ever fail to protect this devotee, do not ever fail.

Monday, August 1, 2011

महारानी और दो गुलाम:-
महारानी को सोफा
गुलामों
को लकड़ी की कुर्सियां-
Hariyali (Singhara) Teej: Thursday, 12 August 2010

श्रावन मास के शुक्ल पक्षकी तृतीया को हरियाली तीज कहते हैं । इस दिन महिलाएँ भवानी-पार्वती का पूजन करती हैं।
राजस्थान की परम्परा में इस माह लडकियों को ससुराल से पितृ गृह बुला लिया जाता है। जिस लडकी के विवाहके पश्चात्* पहला सावन आया हो, उसे ससुराल में नहीं रखा जाता ।
सावन में सुन्दर-से-सुन्दर पकवान पका कर बेटियों को सिंघारा भेजा जाता है । इस माह में हिंडोले पर झूला जाता है।
इस तीज पर मेहँदी लगाने का विशेष महत्व है, जो सुहाग का चिह्न माना जाता है। कहा जाता है कि इस दिन गौरा विरहाग्नि में तपकर शिवसे मिली थीं।

Hariyali Teej (Singhara Teej) is one of the most widely celebrated festivals of Rajasthan & also of some part Central & North India. Swings, traditional songs and dancing are the unique features of Teej celebrations in Rajasthan. Women perform traditional folk dance dressed in green colored clothes and sing beautiful Teej songs while enjoying their sway on swings bedecked with flowers.
On this day, women and young girls wear their best clothes and adorn themselves with fine jewelry. They gather at a nearby temple or a common place and offers prayers to Goddess Parvati for well-being of their husband.

Swings are hung from trees and decorated with fragrant flowers. Women both married and unmarried love to swing on these swings to celebrate the ’sawan festival'.


Saturday, June 25, 2011

युग परिवर्तन

देख तेरे इस देश की हालत क्या हो गयी भगवान् कितना बदल गया इंसान ???????

जय श्री भ्रष्टाचार जी की |

































New accounting terminology to go into effect:






1Crore = 1 Khoka





500Cr = 1 Koda





1000Cr = 1 Radia




10000Cr = 1 Kalmadi


100000Cr = 1Raja


100Raja = 1 Pawar










10000 Pawar


=


=


=


=


=


=











Itna forward karo ki pura INDIA padhe.


साभार chaturvedi ji

भयभीत कांग्रेस और लोकपाल

बाबा रामदेव के हरिद्वार लौट जाने और अन्ना हजारे के दिल्ली आ जाने के
बाद भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के संघर्ष को एक नया सेनापति मिल गया है।
इस बार केन्द्र सरकार के सामने दुनियादारी से दूर रहने वाला बाबा रामदेव
नहीं है। अबकी बार उसका मुकाबला अपने आप को दांव पर लगाने वाले अन्ना
हजारे, अरविन्द केजरीवाल, श्रीमती किरण बेदी जैसे हजारों लोगो से है, जो
ना केवल राजनेताओं के असली चरित्र से परिचित हैं, अपितु यह भी जानते हैं
कि सरकार मीडिया और सत्ता का उपयोग कर किस तरह से समर्थकों और भारत की आम
जनता को भ्रमित करने में कुशल हैं। इससे यह भी साबित होता है कि सरकार
कितना भी दमन कर ले] एक के बाद एक लोग आंदोलन का नेतृत्व करने के लिये
सामने आते रहेंगें।

यह भी आश्चर्यजनक है कि केन्द्र सरकार इस बात के लिये तो राजी है कि
ग्रामसेवक से लेकर संयुक्त सचिव तक के कर्मचारी और अधिकारी लोकपाल के
दायरे में आयें, लेकिन वह उन लोगों को लोकपाल से दूर रखना चाहती है, जो
नीति निर्माण के लिए उत्तरदायी हैं और वे ही भ्रष्टाचार के पोषक होने के
लिए भी जिम्मेदार हैं। सरकार का यह रूख भारत के आम आदमी को ना केवल
भ्रष्ट साबित कर रहा है, अपितु यह भी कह रहा है कि भारत का आम आदमी
भ्रष्ट है। भारत के नागरिकों को इससे बड़ा अपमान किसी सरकार ने नहीं किया
होगा।

इसी क्रम में आजकल सरकारी पक्ष एक नई कहानी को हवा दे रहा है, कहा जा रहा
है कि भारत में भ्रष्टाचार मुद्दा ही नहीं है, और भारत का समाज तो
भ्रष्टाचार को हमेशा से ही स्वीकार करता रहा है और भारत में निवास करने
वाले संत महात्माओं के मठ और पीठ अवैध कमाई को संरक्षित करने का ठिकाना
बन गये हैं। इसलिये केन्द्र सरकार का यह प्राथमिक कर्तव्य है कि वह
भ्रष्टाचार का ठिकाना बने इन केन्द्रों को ढ़ूंढ़ ढ़ूंढ़ कर नष्ट कर दे। ये
सब बातें देश के सत्ताधारी राजनेताओं की तरफ से तब से कही जाने लगी है,
जब से बाबा रामदेव ने भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार को घेरा और विगत ४-५
जून की रात्रि को केन्द्र सरकार ने बाबा रामदेव और उनके समर्थकों को मार
मार कर नई दिल्ली के रामलीला मैदान से भगा दिया और उस पर यह भी कि
प्रधानमंत्री कहते हैं कि इसके अलावा और कोई चारा ही नहीं बचा था।

ध्यान देने लायक बात है कि ये बातें आम जनता की नहीं हैं, ये बातें उन
लोगों की तरफ से आईं हैं, जिनसे देश की जनता ने उनकी अकूत कमाई का राज
पूछा है और इतना कुछ सहने के बाद भी देश की जनता यह जानना चाहती है कि
गोरे अंग्रेजों से सत्ता प्राप्त कर लेने के बाद जिन भी नेताओं ने सत्ता
का उपभोग किया है, वो भारत के नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं दिला पाने
में क्यों विफल रहे ? कैसे भारत का सर्वांगीण विकास कुछ मुट्ठी भर लोगों
के विकास में कैद हो गया ? कैसे कुछ भ्रष्ट लोगों ने सत्ता प्रतिष्ठान पर
कब्जा करके अपनी तिजोरियों का ना केवल भर लिया अपितु उसे विदेशी बैंकों
में भी जमा करा दिया। तो फिर यह क्यों नहीं यह माना जाय कि देश आज भी
आजादी को तरस रहा है, और अबकि बार संग्राम गोरों से नहीं सत्ता को धंधा
बना चुके लालची राजनेताओं से है।

आज जब भारत का प्रत्येक राजनीतिक दल सत्ता का उपभोग कर चुका है, भारत की
आम जनता इस मुद्दे पर राजनितिक समर्थन को लेकर असमंजस में है, आम जनता का
विश्वास भी राजनीतिक दलों से उठ गया है, इसीलिये सामाजिक कार्यकर्त्ता और
देश के प्रमुख संत चाहे वो बाबा रामदेव हो या श्री श्री रविशंकर अपने
समर्थकों के साथ सड़कों पर भ्रष्टाचार के दानव से मुक्ति के लिए संघर्ष कर
रहे हैं। परन्तु राजसत्ता, भारत के सामान्य नागरिकों के इस आंदोलन को
राजनीतिक बताने का दुस्साहस कर रही है। क्या भ्रष्टाचार कुछ दलों की ही
समस्या है ? इसके कारण देश की आंतरिक सुरक्षा खतरे में नहीं पड़ गई है ?

इस बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि केन्द्र सरकार हर प्रकार से उन
सभी लोगों को पथभ्रष्ट साबित करने की हिमाकत कर रही है, जो लोग केन्द्र
सरकार से भ्रष्टाचार पर स्पष्ट नीति बनाने की बात कर रहे हैं, और विदेशों
में जमा पैसे को वापस लाने की मांग को पूरा करने की जिद पर अड़े हुए हैं।
इसी के साथ सत्ता द्वारा उन प्रतीक चिन्हों पर भी लगातार आक्रमण हो रहे
हैं, जिनके बारे में सरकार को यह अंदेशा है कि वो जनता के सामने आस्था का
केन्द्र हैं। चाहे वह सत्यसाई बाबा के निधन के बाद उनके आश्रम की संपत्ति
हो या बाबा रामदेव के ट्रस्ट की संपत्ति का मामला हो या अन्ना हजारे की
नैतिकता का प्रश्न ? सरकार का हर कदम रोज़ एक नए संदेह को जन्म दे रहा
है। सरकार की मंशा भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के नेताओ को बदनाम करने की
है, उसका हर कदम हर बार इस बात को सिद्ध करता है कि सरकार हर उस आदमी की
आवाज को दबा देने की मंशा रखती है, जिस आवाज में सरकार से जवाब मांगने की
बुलंदी हो।

आश्चर्यजनक तो यह है कि केन्द्र सरकार जितनी दृड़ संकल्पित इन आंदोलनों को
कुचलने के लिये दिखती है, उसका उतना दृड़ संकल्प भ्रष्टाचार निरोध के उपाय
करने में नहीं दिखता। राजनीतिक समीक्षक यह मानने लगे हैं कि सरकार
लोकतंत्र को मजबूत करने की बजाय उसका इस्तेमाल रक्षाकवच के रूप में कर
रही है। यह याद रखे जाने की जरूरत है कि लोकतंत्र की नींव ही ‘असहमति के
आदर व सम्मान’ पर टिकी है और जिस प्रकार से सरकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं
और संस्थाओं को अपना व्यक्तिगत दुश्मन मानने लगी है, उससे यह प्रमाणित
होने लगा है कि सरकार की नीयत में खोट है और अब तो जनता का यह विश्वास और
ज्यादा गहरा हो गया है कि सरकार ‘अपने संरक्षणकर्ताओं’ को बचाने के लिए
अपनी संवैधानिक ताकत का ठीक उसी प्रकार से दुरूपयोग कर रही है, जैसी कि
ब्रिटिश शासन काल में महारानी विक्टोरिया के सैनिक करते थे।

यह भी आश्चर्यजनक है कि देश ही नहीं विदेश के सभी प्रबुद्धजन आज भी
प्रधानमंत्री को बेईमान नहीं मानते। हां, वे देश के वर्तमान हालातों में
प्रधानमंत्री की विवेकहीनता और अनिर्णय की स्थिति से निराश जरूर हैं। तो,
ऐसी स्थिति में कांग्रेस को प्रस्तावित लोकपाल बिल से क्या आपत्ति हो
सकती है ? दुर्भाग्यजनक स्थिति तो यह है कि कांग्रेस भी मनमोहन सिंह को
भारत के प्रधानमंत्री की बजाय एक ऐसे सेवक के रूप में देखती है, जो
श्रीमति सोनिया गांधी के प्रति वफादार है। तो हमें यह समझने की जरूरत है
कि एक ओर जहाँ देश की आम जनता लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री सहित
सर्वोच्च नौकरशाही को लेने के लिए आंदोलनरत है, वहीं कांग्रेसी आज भी
श्रीमती सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका को प्रधानमंत्री बनते हुए
देखना चाहते हैं । इसीलिये कांग्रेस को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को
लोकपाल के दायरे में लाने में कोई एतराज नहीं है, दिक्कत तो तब है जब
गाँधी परिवार का कोई सदस्य इस देश का प्रधानमंत्री बनेगा. इसके अलावा
कांग्रेस को एक भय भी सता रहा है कि प्रधानमंत्री के लोकपाल के दायरे में
आ जाने के बाद कांग्रेस के अस्तित्व पर ही संकट आ जायेगा, क्योंकि
कांग्रेस में ईमानदारी और ईमानदार नेताओं का संकट है।

Monday, June 20, 2011

वन्दे मातरम्।
सुजलां सुफलां मलय़जशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।१।।

शुभ्रज्योत्स्ना पुलकितयामिनीम्,
फुल्लकुसुमित द्रुमदलशोभिनीम्,
सुहासिनीं सुमधुरभाषिणीम्,
सुखदां वरदां मातरम् । वन्दे मातरम् ।।२।।

कोटि-कोटि (सप्तकोटि) कण्ठ कल-कल निनाद कराले,
कोटि-कोटि (द्विसप्तकोटि) भुजैर्धृत खरकरवाले,
अबला केनो माँ एतो बॉले (के बॉले माँ तुमि अबले),
बहुबलधारिणीं नमामि तारिणीम्,
रिपुदलवारिणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।३।।

तुमि विद्या तुमि धर्म,
तुमि हृदि तुमि मर्म,
त्वं हि प्राणाः शरीरे,
बाहुते तुमि माँ शक्ति,
हृदय़े तुमि माँ भक्ति,
तोमारेई प्रतिमा गड़ि मन्दिरे-मन्दिरे। वन्दे मातरम् ।।४।।

त्वं हि दुर्गा दशप्रहरणधारिणी,
कमला कमलदलविहारिणी,
वाणी विद्यादायिनी, नमामि त्वाम्,
नमामि कमलां अमलां अतुलाम्,
सुजलां सुफलां मातरम्। वन्दे मातरम् ।।५।।

श्यामलां सरलां सुस्मितां भूषिताम्,
धरणीं भरणीं मातरम्। वन्दे मातरम् ।।६।।>

Friday, June 17, 2011

Pay tex for ???????????

बंगलोर के एक पॉश इलाके व्हाइटफ़ील्ड में स्थित सौख्य इंटरनेशनल होलिस्टिक सेंटर में एक वीआईपी मरीज का आयुर्वेदिक इलाज किया जा रहा है, उसे फ़ाइव स्टार श्रेणी की “पंचकर्म चिकित्सा” सुविधा दी जा रही है, ताकि वह जल्द से जल्द स्वस्थ हो सके। यह चिकित्सा उसे माननीय-माननीय (108 बार और जोड़ें) सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप प्रदान की जा रही है। यह वीआईपी मरीज कोई और नहीं, बल्कि कोयम्बटूर एवं बंगलोर बम धमाकों का प्रमुख आरोपी अब्दुल नासेर मदनी है। उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने अब्दुल नासेर मदनी के लश्कर से सम्बन्धों की बात स्वीकार की है और जाँच जारी है, परन्तु इस आतंकवादी को बंगलोर के निकट पाँच सितारा स्पा सेण्टर में इलाज दिया जा रहा है, क्योंकि भारत एक “सेकुलर” देश है। ज़ाहिर है कि अब्दुल नासेर मदनी के 26 दिन के इस आयुर्वेदिक कोर्स का लगभग दस लाख का खर्च भारत के ईमानदार करदाताओं की जेब से ही जाएगा। (चित्र में मदनी का आलीशान सुईट)


सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत अब्दुल नासेर मदनी को 7 जून को इस स्पा केन्द्र में भरती किया गया है, क्योंकि “मदनी बचाओ समिति” नाम की “सुपर-सेकुलर संस्था” ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिका दायर करके बताया कि फ़िलहाल व्हील चेयर पर जीवन बिता रहे अब्दुल मदनी को डायबिटीज़, पीठ दर्द एवं न्यूराइटिस (तलवों में जलन) की वजह से चिकित्सा सहायता मुहैया करवाना आवश्यक है। कर्नाटक पुलिस अपना मन मसोसकर और खून जलाकर अब्दुल नासेर मदनी की सेवा में पाँच पुलिस वालों को दिन-रात लगाए हुए है, सोचिये कि पुलिसवालों की मनःस्थिति पर क्या गुज़रती होगी?

साध्वी प्रज्ञा भी मालेगाँव बम धमाकों के सिलसिले में मुम्बई पुलिस की हिरासत में हैं, उनके साथ जो सलूक हो रहा है वह आप यहाँ पढ़ सकते हैं (Sadhvi Pragya Hindu Terrorist??), परन्तु अब्दुल मदनी के इलाज की इस “सेकुलर” घटना से सबसे पहला सवाल तो यही खड़ा होता है कि क्या किसी आतंकवादी को इस प्रकार की पंचकर्म चिकित्सा दी जानी चाहिए? और चलो मान लो कि “गाँधीवादी नपुंसक इंजेक्शन” की वजह से “सेकुलर भारतवासी” इस आतंकवादी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना कर भी लें तब भी इसका खर्च हमें क्यों उठाना चाहिए? सुप्रीम कोर्ट को यह निर्देश देना चाहिए था कि मदनी के इस इलाज का पूरा खर्च उसे और उसकी संस्थाओं को दुबई एवं केरल के मदरसों से मिलने वाले चन्दे से वसूला जाए।

एक रिटायर्ड पुलिस अधिकारी ने अपनी व्यथा ज़ाहिर करते हुए कहा कि “क्या पूरे देश के लाखों कैदियों में सिर्फ़ अब्दुल मदनी ही इन बीमारियों से पीड़ित है? फ़िर सिर्फ़ अकेले उसी को यह विशेष सुविधा क्यों दी जा रही है?”, परन्तु ऐसे सवाल पूछना बेकार है क्योंकि माननीय सुप्रीम कोर्ट ने ही आदेश दिया है और मदनी को बचाने वाली संस्थाएं “सेकुलर” मानी जाती हैं, और वोट बैंक की इस “घृणित” राजनीति के कारण ही 2006 में केरल विधानसभा (जहाँ सिर्फ़ कांग्रेस और वामपंथी हैं) ने सर्वानुमति से एक प्रस्ताव पारित करके अब्दुल नासेर मदनी को रिहा करने की माँग की थी, और जब स्वयं प्रधानमंत्री भी हमें चेता चुके हैं कि संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का है तो हमें स्वीकार कर लेना चाहिए…

अफ़ज़ल गुरु हो या अजमल कसाब, भारत सरकार से वीआईपी ट्रीटमेण्ट लेना उनका “पैदाइशी अधिकार” है। वैसे तो “सेकुलरिज़्म” अपने-आप में ही एक घटिया चीज है, लेकिन जब वह कांग्रेस और वामपंथियों के हाथ होती है, तब वह घृणित और बदबूदार हो जाती है… भाजपा भी उसी रास्ते पर चलने की कोशिश कर रही है। ऐसे में “राष्ट्रवादी तत्व” अपना सिर पटकने के लिये अभिशप्त हैं, जबकि “सिर्फ़ मैं और मेरा परिवार” मानसिकता के अधिसंख्य अज्ञानी हिन्दू पैसा कमाने और टैक्स चुकाने में मशगूल हैं, ताकि उस टैक्स के पैसों का ऐसा “सदुपयोग” हो सके…।

(सुप्रीम कोर्ट पर कोई भी टिप्पणी करते समय कृपया “माननीय X 108” शब्द का उपयोग अवश्य करें…)
==========


अब थोड़ा सा विषयांतर :
चलते-चलते :- बाबा रामदेव के आंदोलन को असफ़ल करने में एक प्रमुख भूमिका निभाने वाले अण्णा हजारे का एक रूप यह भी है, नीचे दी गई लिंक देखें… गाँधीवादी अण्णा, गैर-मराठियों को बाहर करने के मुद्दे पर राज ठाकरे का समर्थन कर रहे हैं…। मैंने पिछली पोस्ट में राज ठाकरे के साथ अण्णा का फ़ोटो दिया था, वह यही इशारा देने के लिए दिया था, कि अण्णा का कोई भरोसा नहीं, ये रामदेव बाबा-भगवाधारियों-संघ-भाजपा का विरोध करते हैं, लेकिन राज ठाकरे की तारीफ़ करते हैं…। महाराष्ट्र में इनके विरोधी इन्हें "सुपारीबाज अनशनकारी" कहते हैं, तो निश्चित ही कोई मजबूत कारण होगा, जो कि जल्दी ही सामने आ जायेगा…
http://newshopper.sulekha.com/hazare-backs-raj-thackeray-s-tirade-against-non-marathis_news_1024638.htm

अग्निवेश नामक “सेकुलर वामपंथी दलाल” को तो सभी लोग अच्छी तरह जानते हैं, इसलिये उसकी बात करना बेकार है…रही बात केजरीवाल और भूषणों की, वे भी जल्दी ही बेनकाब होंगे। रामदेव बाबा (यानी भगवाधारी) को "भ्रष्ट" और "कारोबारी" बताकर उनकी मुहिम का विरोध करने वाले, जल्दी ही सोच में पड़ने वाले हैं… :)

Tuesday, June 7, 2011

Hello !! beware of malicious notes against the peaceful movement ..!!! Freedom of Expression ---Satyagraha...!! Satyagraha is right ..it is not suicide .. it is right to protest -non-violent way of protest .. against the system which is not listening in anyway , months together ..even in Parliament opposition's protests were not given an ear .. what a Democracy..!! protest is fundamental right ..--freedom of expression ..!!!!!! -------------------------------------- BHRASHTACHAARI DESH KE DUSHMAN ...fight against corruption ... fight against corruption .....Taqat humari humse hai ...himmat humari hum se hai ....fight .against corruption...... Financial Terrorism --this loot of nation ---- has been depriving a large section of our population from their fundamental rights ,...it..is..intolerable now ...Now or Never ---FIGHT AGAINST CORRUPTION ''taqat humari'humse hai ..himmat humari humse hai -------------------------------------------------------- Suprabhatam .!.Satyagraham --Satyagraham..---..fight against corruption ...Taqat humari ''hum''se hai ..Himmat humari ''hum'' se hai ......fight against corruption. --------------------------------------------------------------------------------- humsab bhul hi gaye . azadi ko -- uske bejod parwanon ko ..unke balidanon ko ...... loot ke badte zahar ne .. desh ko is haalat par laake patka hai , aaj , --
Veena Srivastava04 जून 08:26
Hello !! beware of malicious notes against the peaceful movement ..!!!
Freedom of Expression ---Satyagraha...!!
Satyagraha is right ..it is not suicide .. it is right to protest -non-violent way of protest .. against the system which is not listening in anyway , months together ..even in Parliament opposition's protests were not given an ear .. what a Democracy..!! protest is fundamental right ..--freedom of expression ..!!!!!! -------------------------------------- BHRASHTACHAARI DESH KE DUSHMAN ...fight against corruption ... fight against corruption .....Taqat humari humse hai ...himmat humari hum se hai ....fight .against corruption...... Financial Terrorism --this loot of nation ---- has been depriving a large section of our population from their fundamental rights ,...it..is..intolerable now ...Now or Never ---FIGHT AGAINST CORRUPTION ''taqat humari'humse hai ..himmat humari humse hai -------------------------------------------------------- Suprabhatam .!.Satyagraham --Satyagraham..---..fight against corruption ...Taqat humari ''hum''se hai ..Himmat humari ''hum'' se hai ......fight against corruption. --------------------------------------------------------------------------------- humsab bhul hi gaye . azadi ko -- uske bejod parwanon ko ..unke balidanon ko ...... loot ke badte zahar ne .. desh ko is haalat par laake patka hai , aaj , --
कल से यह नई websites संघ के प्रचार विभाग की और से प्रारंभ हो रही है इसका उपयोग समाचारों के लिए कर सकते हैं | www.newsbharati.com

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Web Bharati is an initiative of a team of professionals. It can be best described as a profession with a mission. Through various initiatives, we intend to establish an effective presence of nationalist movement on the emerging web media.

The first initiative in this direction is a news portal, NEWSBHARATI. Effective and exclusive coverage of Seva activity, the unique concept of Watch zones for various subjects with effective tools for regional as well as subject-wise social networking, comprehensive coverage of RSS and related movements shall be the USP [Unique selling points] of this comprehensive news portal. A mobile version of newsbharati shall also be launched simultaneously.

THE SITE WILL BE LAUNCHED ON TOMORROW THE 4 JUNE 2011. PLEASE SPREAD THIS MESSAGE TO ALL YOUR CONTACT LIST

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with thanks

milind oak

डलहौजी की हड़प- नीति की वापसी

किसानो की जमीनों का बढ़ता अधिग्रहण इसी का धोतक हैं |

हम मेहनतकश ,जगवालों से ,
जब अपना हिस्सा मांगेगे ,
एक खेत नही ,एक देश नही ,
हम सारी दुनिया मांगेगे |
यहाँ सागर -सागर मोती है ,
यहाँ पर्वत- पर्वत हीरे है ,
य़े सारा माल हमारा है ,
हम सारा खजाना मांगेगे |


हमारी हालत देखो
पुलिस अत्याचार
महिलाओं की पिटाई
अधिग्रहण ने जान ले ली

ब्रिटिश राज्य के विरुद्ध 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का एक बहुचर्चित कारण डलहौजी की "हड़प - नीति "को बताया जाता रहा है |सभी जानते है कि ,इस नीति के तहत उसने कई देशी रियासतों को हडप लिया था |उसने दत्तक पुत्र के गद्दी -नशीन होने के अधिकार को समाप्त कर दिया था| ऐसा नही है कि रियासतों को हडपने और ब्रिटिश राज्य में मिलाने का काम केवल डलहौजी ने किया था| सही बात तो यह है ब्रिटिश राज्य की शुरुआत ही रियासतों को खत्म करके उसे ब्रिटिश राज्य का आधिपत्य क्षेत्र बनाने के रूप में हुई थी| फिर ज्यों-ज्यों ब्रिटिश राज्य का विस्तार होता गया, त्यों-त्यों देशी रियासतों का ब्रिटिश हुक्मरानों द्वारा हडपना भी जारी रहा| उदाहरण स्वरूप डलहौजी के आने के कुछ साल पहले 1839 में मांडवी और 1840 में कोलाबा और जालोन तथा 1842 में सूरत की रियासतों को कम्पनी के गवर्नर जनरल ने ब्रिटिश राज्य में मिला लिया था |डलहौजी का कार्यकाल जरा ज्यादा आक्रामक था |उसने तो आते ही यह बात स्पष्ट कर दी थी की वह ब्रिटिश राज्य का इस देश के समस्त भू-भाग पर प्रत्यक्ष अधिकार चाहता है |
वह किसी भी देशी रियासत राजे -रजवाडो ,नबाबो ,बादशाहों को इस देश में नही रहने देना चाहता था |कम्पनी के गवर्नर जनरल के रूप में डलहौजी का कार्यकाल 1848 से शुरू हुआ |नि: संदेह ,भारत में अंग्रेजी साम्राज्य को बढ़ाने में उसका योगदान भी बडा था |वह कम्पनी के चंद महत्वपूर्ण गवर्नर जरनलो में से एक था |उसने भारत की किसी भी रियासत को ब्रिटिश राज्य में विलय करने का एक भी अवसर जाने नही दिया |अपनी हडप - नीति के तहत उसने रियासतों में दत्तक पुत्र के अधिकार को मंसूख कर के उन्हें ब्रिटिश राज्य का हिस्सा बना लिया |इसके अंतर्गत उसने सतारा को 1848 में ,जैतपुर और सम्भलपुर को 1849 में ,वघाटको 1850 में ,अदेपुर को 1852 में झाँसी को 1853 में और नागपुर को 1854 में हडप कर कम्पनी राज्य का हिस्सा बना लिया |इसके अलावा हैदराबाद के वराडक्षेत्र को भी १८५३ में मिला लिया |इसे उसने निजाम हैदराबाद पर ब्रिटिश राज्य की बकाया रकम के एवज में ले लिया |1856 में अवध क्षेत्र का ब्रिटिश राज्य में विलय कर लिया| डलहौजी की विलय या हडप - नीति से ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार तेज़ी के साथ बढ़ा |फिर उसी शासन काल में कम्पनी ने पंजाब का अभी तक अविजित हिस्सा भी जीतकर ब्रिटिश राज्य में मिला लिया था |इसी के साथ अब हिन्दुस्तान के समूचे भू-भाग पर कम्पनी का प्रभुत्व स्थापित हो गया था |डलहौजी के शासन काल में ईस्ट इंडिया कम्पनी के राज का न केवल विस्तार किया गया बल्कि सैन्य ताकत में खासकर सिक्ख रेजीमेंट ,गोरखा रेजीमेंट आदि के रूप में वृद्धि की गयी |शिक्षा के सम्बन्ध में प्राथमिक स्तर से उच्च स्तर की शिक्षा के लिए "वुड्स डिस्पैच "के नाम से सुधार भी उसी के शासन काल में लागू किये गये |
डलहौजी के शासन काल के दौरान 1853 में रेलवे का आरम्भ किया गया |पहली रेल लाइन बम्बई से थाणे तक बिछायी गयी |बिजली और टेलीग्राफ का आरम्भ भी उसी समय (1852 से )किया गया |इसके अलावा डाक सुधार तथा सार्वजनिक निर्माण में भी भारी सुधार तथा विस्तार किया गया| बताने की जरूरत नही कि ,ये सारे काम ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी और उसके हितो के अनुसार किये गये |1857 -58 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिश हुकूमत की फ़ौज द्वारा हिन्दुस्तानियों के दमन में भी ये आधुनिक विकास ब्रिटिश राज के हाथ के अत्यन्त सक्षम हथियार बने |डलहौजी और उसकी हडप - नीति तथा ब्रिटिश राज्य द्वारा किये जा रहे ढाचागत व् अन्य सुधार परस्पर सम्बन्धित थे |उदाहरण स्वरूप , सतारा और नागपुर की रियासतों के विलय का एक कारण यह भी था कि , ये दोनों रियासते ,बम्बई _मद्रास तथा मद्रास -कलकत्ता के बीच संचार -व्यवस्था के निर्माण -विस्तार में रुकावट थी |कम्पनी के व्यवसायिक हितो के लिए डलहौजी और उसके पूर्ववर्ती गवर्नर जनरलों द्वारा उठाये गये कामो में हिन्दुस्तानी रियासतों का जबरिया अधिग्रहण भी शामिल था |यह रियासतों की जमीन का ,समस्त सम्पदा का कम्पनी द्वारा किया जा रहा अधिग्रहण भी था |
1857 के महासमर के बाद 1858 से ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन समाप्त हो गया |उसकी जगह ब्रिटेन की समस्त बड़ी कम्पनियों की घुसपैठ और उनके लाभ को विस्तार देने वाली ब्रिटिश सम्राज्ञी के राज्य की स्थापना हो गयी |इसने रियासतों कोअपने ब्रिटिश राज्य के अधीन करके उन्हें हडपने का काम तो रोक दिया ,परन्तु जरूरतों के मुताबिक़ जमीन हडपने का काम जारी रखा |1894 का भूमि अधिग्रहण का कानून इसीलिए लाया गया था |उसमे आ रही बाधाओं ,विरोधो को दूर करने के लिए बनाया गया था | आप जानते होंगे कि देश की 1947 से बनी सत्ता -सरकार ने ब्रिटिश राज द्वारा हिन्दुस्तान को लूटने -पाटने के लिए बनाये गये तमाम कानूनों की तरह ही 1894 के कानून को भी आज तक लागू किया हुआ है |कोई भी समझ सकता है कि ब्रिटिश राज्य द्वारा 1894 का भूमि अधिग्रहण कानून आदिवासियों ,ग्रामवासियों की जमीने हडप लेने का कानून था |डलहौजी की "हडप - नीति "का नया संस्करण था |
फिर अब देश में 10-15 साल से तेज़ी से बढाये जाते रहे कृषि भूमि का अधिग्रहण मुख्यत: देशी -विदेशी कम्पनियों के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष हितो में किया जा रहा अधिग्रहण है |यह अधिग्रहण भी उसी 1894 के कानून के अंतर्गत किया जा रहा है |अत :वर्तमान दौर के अधिग्रहण को भी कम्पनी हित में डलहौजी की हडप - नीति से अलग नही किया जा सकता |अपने सारतत्व में यह देश की केन्द्रीय व् प्रांतीय सरकारों द्वारा "हडप - नीति " के वर्तमान दौर का परिलक्षण है |
फिर याद रखना चाहिए कि वर्तमान दौर का भूमि अधिग्रहण भी साम्राज्यी विश्व व्यवस्था के निर्देशों के अनुसार चलाया जा रहा है |इस देश में ही नही बल्कि दुनिया के तमाम पिछड़े व् विकासशील देशो में भी चलाया जा रहा है |यह देश की चोटी की कम्पनियों के साथ ईस्ट इंडिया कम्पनी से कई गुना ताकतवर ,बहुराष्ट्रीय औद्योगिक , वाणिज्यिक एवं वित्तीय कम्पनियों के हितो को उनके निजी लाभ ,मालिकाने को विस्तार देने के लिए किया जा रहा है |देश की केन्द्रीय व् प्रांतीय सरकारों द्वारा यह काम एक दम नग्न रूप में किया जाता रहा है |सिंगुर ,नंदीग्राम ,टप्पल ,जैतापुर ,भट्टा परसौल ......तथा देश के विभिन्न प्रान्तों ,क्षेत्रो में अधिग्रहण को किसानो द्वारा किये जा रहे विरोधो के वावजूद यह हडप - नीति लगातार जारी है |
धनाढ्य कम्पनियों और उनके उच्च स्तरीय सेवको के हितो की पूर्ति के लिए विषिष्ट आर्थिक क्षेत्र ,टाउनशिप ,तथा -चौड़ी -चौड़ी सडको का निर्माण किया जा रहा है |अगर डलहौजी की १८५७ की "हडप नीति "के विरुद्ध राजे -रजवाड़े खड़े हो सकते थे ,तो आज किसान भी खड़े हो सकते है और खड़ा होना चाहिए |उनके संघर्ष कंही ज्यादा न्याय संगत है |कयोकि किसानो का संघर्ष अपने राज्य के लिए नही ,बल्कि पुश्त दर पुश्त से चलती आ रही जीविका को बचाने के लिए है |अपने जीवन की आवश्यक आवश्यकताओ के लिए है |इसलिए उनके विरोध को आज कई परिस्थितियों के अनुसार देश -प्रदेश स्तर पर संगठित किये जाने की आवश्यकता है |भूमि अधिग्रहण की वर्तमान नीति व् उसके क्रियान्वयन के विरोध के साथ वर्तमान विश्व व्यवस्था की नीतियों ,सम्बन्धो के विरोध को खड़ा किये जाने की आवयश्कता है |उसके लिए जनसाधारण को एकताबद्ध किये जाने की आवश्यकता है |

...................आज इस गीत के साथ पूरे भारत के किसान बुलाते है लोगो को .............................

आज घोषणा करने का दिन
हम भी है इंसान |
हमे चाहिए बेहतर दुनिया
करते है ऐलान |
कोई कैसी भी दासता
हमे नही स्वीकार |
मुक्ति हमारा अमिट स्वप्न है
मुक्ति हमारा गान

LOKPAL BILL-----The deferences between government & civil society.

For your education if you do not already know this ---- See how Lokpal Bill can curb the politicians , Circulate it to create awareness

Existing System

System Proposed by civil society

No politician or senior officer ever goes to jail despite huge evidencebecause Anti Corruption Branch (ACB) and CBI directly come under the government. Before starting investigation or initiating prosecution in any case, they have to take permission from the same bosses, against whom the case has to be investigated.

Lokpal at centre and Lokayukta at state level will be independent bodies. ACB and CBI will be merged into these bodies. They will have power to initiate investigations and prosecution against any officer or politician without needing anyone’s permission. Investigation should be completed within 1 year and trial to get over in next 1 year. Within two years, the corrupt should go to jail.

No corrupt officer is dismissed from the jobbecause Central Vigilance Commission, which is supposed to dismiss corrupt officers, is only an advisory body. Whenever it advises government to dismiss any senior corrupt officer, its advice is never implemented.

Lokpal and Lokayukta will havecomplete powers to order dismissal of a corrupt officer. CVC and all departmental vigilance will be merged into Lokpal and state vigilance will be merged into Lokayukta.

No action is taken against corrupt judges because permission is required from the Chief Justice of India to even register an FIR against corrupt judges.

Lokpal & Lokayukta shall havepowers to investigate and prosecute any judge without needing anyone’s permission.

Nowhere to go - People expose corruption but no action is taken on their complaints.

Lokpal & Lokayukta will have toenquire into and hear every complaint.

There is so much corruption within CBI and vigilance departments. Their functioning is so secret that it encourages corruption within these agencies.

All investigations in Lokpal & Lokayukta shall be transparent.After completion of investigation, all case records shall be open to public. Complaint against any staff of Lokpal & Lokayukta shall be enquired and punishment announced within two months.

Weak and corrupt people are appointed as heads of anti-corruption agencies.

Politicians will have absolutely no say in selections of Chairperson and members of Lokpal & Lokayukta. Selections will take place through a transparent and public participatory process.

Citizens face harassment in government offices. Sometimes they are forced to pay bribes. One can only complaint to senior officers. No action is taken on complaints because senior officers also get their cut.

Lokpal & Lokayukta will get public grievances resolved in time bound manner, impose a penalty of Rs 250 per day of delay to be deducted from the salary of guilty officer and award that amount as compensation to the aggrieved citizen.

Nothing in law to recover ill gotten wealth. A corrupt person can come out of jail and enjoy that money.

Loss caused to the government due to corruption will be recovered from all accused.

Small punishment for corruption- Punishment for corruption is minimum 6 months and maximum 7 years.

Enhanced punishment - The punishment would be minimum 5 years and maximum of life imprisonment.


Spread it like fire ;
our Nation needs us..please Contribute..

This is not just a forward, it’s the future of our Nation

प्रधानमंत्री जवाब दो

प्रधानमंत्री जवाब दो
Posted on जून 7, 2011 by surenderachaturvedi

बाबा रामदेव के सत्याग्रह के दौरान 4-5 जून की रात्री में केन्द्र सरकार
के इशारे पर जो कुछ हुआ, उसे देश ही नहीं पूरी दुनिया के लोगों ने देखा।
सभी जानना चाहते हैं कि जितने भी लोग बाबा रामदेव के साथ अनशन पर बैठे
थे, वे क्या चाहते थे? वे सिर्फ इतना चाहते कि केन्द्र सरकार एक अध्यादेश
लाए जिसमें कहा जाए कि “विदेशो जमा कालाधन राष्ट्रीय संपत्ति है और
केन्द्र सरकार उसको वापस लाने के लिए वचनबद्ध है।”
यह मांग किसी राजनीतिक दल की नहीं है, यह मांग उन करोड़ों भारतीय की है,
जो अपने खून पसीने की कमाई को विभिन्न कर के रूप में भारत सरकार को
इसलिये देते हैं कि वे जिस देश में रहते हैं, उस देश का समग्र विकास हो,
हर हाथ को काम मिले, बच्चों को शिक्षा मिले, गांवों में आधारभूत सुविधाएं
उपलब्ध हो, हर खेत को पानी मिले, जिससे यह देश फिर गुलामी के दलदल में
नहीं फंसे और भारत स्वाभिमान के साथ फिर से उठ खड़ा हो।
प्रश्न यह उठता है कि क्या यह मांग गलत है? क्या भारत के नागरिकों को
चाहे वे करदाता हों या ना हों, उन्हैं यह अधिकार नहीं है कि वे देश के
विकास की मांग करें, वे सरकार से स्वच्छ प्रशासन की अपेक्षा करें । वे
देश की उस समस्या से मुक्ति की इच्छा भी व्यक्त करें जिससे आम आदमी
त्रस्त और परेशान है। क्या यह मांगें राजनीतिक हैं? जो लोग वहां इकटठा
हुए थे, वे अपने लिए आरक्षण नहीं मांग रहे थे, ना ही यह कह रहे थे कि
भारत में आतंक फैलाने के अपराध में फांसी की सजा पाए अफजल गुरू और
मोहम्मद कसाब को तत्काल फांसी दी जाए, ना ही उन्होंने किसी राजनीतिक
व्यक्ति का नाम अपने मंच से लिया था और ना ही उन्होंने प्रधानमंत्री
मनमोहन सिंह के मंत्रीमंडल में शामिल मंत्रियों के इस्तीफे की मांग की
थी। तो फिर ऐसा कौनसा कारण था कि केन्द्र सरकार ने पांडाल में सोये हुए
लोगों पर आक्रमण बोल दिया, उन पर आंसू गैस के गोले छोड़े, हवाई फायर
किये, मंच को आग लगाकर अफरा तफरी का माहौल बना दिया ? वृद्धों, महिलाओं
और बच्चों पर ना केवल लाठियां भांजी अपितु उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार
करते हुए घसीट घसीट कर बाहर निकाला।
आखिर कैसे हमारे लाचार और बेचारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, जिनको यह पता
ही नहीं चलता कि उनकी सरकार में कितने मंत्रयिों ने कितना भ्रष्टाचार कर
लिया, उनमें अचानक इतनी ताकत आ जाती है कि वे कहने लगे कि इस कार्यवाही
के अलावा उनकी सरकार के पास और कोई विकल्प ही नहीं बचा था। भारत के हर
नागरिक को प्रधानमंत्री से यह प्रश्न पूछना चाहिये कि वे किनको बचाना चाह
रहे हैं? और जो लोग 4-5 जून की रात को पांडाल में थे, क्या उन्होंने
दिल्ली के एक भी नागरिक के साथ अभद्रता की थी? पुलिस या प्रशासन के साथ
असहयोग किया था? क्या बाबा रामदेव के आव्हान पर भारत भर से जो लोग वहां
पर आये थे, वे छंटे हुए गुंडे और बदमाश थे? क्या उनके पास प्राण घातक
हथियार थे ?
क्या वे स्थानीय नागरिकों के लिए खतरा बन गये थे? यदि ऐसा नहीं था, तो इस
बर्बर कार्यवाही का सरकार के पास क्या जवाब है? क्या सरकार यह भूल चुकी
है कि 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्री को भारत एक लोकतांत्रकि देश के रूप
में दुनिया के सामने आ चुका है। भारत में रहने वाले लोगों के कुछ नागरिक
अधिकार भी हैं? जिनकी रक्षा के लिए हर लोकतांत्रकि सरकार जिम्मेदार है?
क्या जिस कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने शिक्षा
प्राप्त की है, वहां उन्हें यही सिखाया और पढ़ाया गया था कि निर्दोष
नागरिकों और अपने संवैधानिक अधिकार के लिए लड़ने वाले लोगों के साथ
अमानवीय व्यवहार किया जाए। क्या प्रधानमंत्री के जन्मदाताओं ने उनकी हर
मांग का जवाब इसी अंदाज में दिया था, जैसा कि उनकी सरकार ने भारत के
नागरिकों के साथ किया? प्रश्न बहुत सारे हैं।
सवाल यह भी है कि यह सरकार भारत के नागरिकों को किस रूप में देखती है, और
जिन मतदाताओं के मतों पर जीतकर सत्ता प्राप्त करती है, उनके साथ किस तरह
का व्यवहार करती है। क्यों भारत के राजनेता हर मुद्दे का राजनीतिकरण कर
देते हैं? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ राजनीतिक दलों का विषय है, इस पर भारत
की जनता को बोलने का कोई अधिकार ही नहीं है, जो भ्रष्टाचार से आकंठ
पीड़ित है? स्वतंत्र भारत में देश की आजादी के बाद भ्रष्टाचार के कई
मामले सामने आये, परंतु किसी भी सरकार ने कभी भी यह साबित करने की कोशिश
नहीं की कि वह किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को लेकर असहनशील है।
सबसे ज्यादा आश्चर्यजनक तो यह है कि सत्तारूढ़ दल के पदाधिकारी या सरकार
के मंत्रियो ने एक बार भी देश की जनता से अपने कुकृत्य के लिए माफी नहीं
मांगी? और बजाय ए राजा, कनीमोझी, सुरेश कलमाडी, सोनिया गांधी, शरद पवार
और अजीत चव्हाण से यह पूछने के कि उनकी अकूत संपत्ति कहां से आई है, वे
बाबा रामदेव से यह पूछ रहे हैं कि इस सत्याग्रह को करने के लिए पैसा कहां
से आ रहा है? और बाबा रामदेव के सहयोगी आचार्य बालकृष्ण को नेपाली नागरिक
बताने वाले कांग्रेस के प्रवक्ता यह क्यों भूल जाते हैं कि उनकी पार्टी
की अध्यक्ष भी भारतीय नहीं है। और जो दिग्विजय सिंह बाबा रामदेव को महाठग
बता रहे हैं, उन्हें यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्र सरकार के ४
मंत्री इस ठग से क्यों बात करने गए थे ?
यह तथ्य भी गौर करने लायक है कि जब से बाबा रामदेव ने सोनिया गांधी और
मनमोहन सरकार पर उनको जान से मार डालने के षड़यंत्र रचने का आरोप लगाया
है,और उन्हैं कुछ भी होने के लिए सोनिया गांधी को जिम्मेदार बताया है, तब
से पूरी कांग्रेस पार्टी बजाय देश से माफी मांगने के सोनिया गांधी के
बचाव में उतर आई है, और कांग्रेस के महामंत्री जनार्दन दिवेदी का यह कहना
कि ‘‘सत्याग्रही मौत से बचने के लिए महिलाओं के कपडे पहनकर भागता नहीं
है।’’ बाबा रामदेव के इस आरोप को पुष्ट ही करता है कि सरकार ने उनको
मारने का षड़यंत्र रचा था।
लेकिन सरकार और कांग्रेस को इतिहास को एक बार खंगाल लेना चाहिये। उन्हैं
यह याद रखना चाहिये कि भारत के नागरिकों का आत्मबल बहुत मजबूत है। जो
भारत 1200 साल की गुलामी सहने के बाद भी अपना अस्तित्व बचाये रख सकता है।
इंदिरा गांधी के कठोर आपातकाल को झेल सकता है, वह सत्ताधीशो की दमनकारी
मानसिकता से डरने वाला नहीं है। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व0
जयनारायण व्यास द्वारा आज से 60 साल पहले लिखी गई यह कविता उन सभी लोगों
के लिए प्रेरणा और चेतावनी हैं जो नागरिकों को सम्मान की निगाह से नहीं
देखते।
‘‘ भूखे की सूखी हडडी से,
वज्र बनेगा महाभयंकर,
ऋषि दधिची को इर्ष्या होगी,
नेत्र तीसरा खोलेंगे शंकर,
जी भर आज सता ले मुझको,
आज तुझे पूरी आजादी,
पर तेरे इन कर्मो में छिपकर,
बैठी है तेरी बरबादी,
कल ही तुझ पर गाज गिरेगा,
महल गिरेगा, राज गिरेगा,
नहीं रहेगी सत्ता तेरी,
बस्ती तो आबाद रहेगी,
जालिम तेरे इन जुल्मों की,
उनमें कायम याद रहेगी।
अन्न नहीं है, वस्त्र नहीं है,
और नहीं है हिम्मत भारी,
पर मेरे इस अधमुए तन में
दबी हुई है इक चिंगारी
जिस दिन प्रकटेगी चिंगारी
जल जायेगी दुनिया सारी
नहीं रहेगी सत्ता तेरी,
बस्ती तो आबाद रहेगी,
जालिम तेरे इन जुल्मों की,
उनमें कायम याद रहेगी।

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