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Saturday, March 26, 2011

विवाह के बिना ही विधवा

समाज raviwar.com से साभार

विवाह के बिना ही विधवा

सारदा लहांगीर रायगड़ा से लौटकर


वह न तो विधवा हैं न विवाहित, मगर उन्हें सिर मुंडाए रखना पड़ता है और सफेद कपड़े पहनने होते हैं. 40 बरस की टांगिरी वाडेबा वाकई विधवा की जिंदगी जी रही हैं.


टांगिरी बताती हैं, ''जब मैं 18 साल की थी तब मेरे गांव के ही एक युवक से मेरी शादी तय हुई थी. हमारे डोंगरिया कोंध वंश की परंपरा के अनुसार दुल्हे के परिजनों और मित्रों ने रिश्ते को लेकर बात की और उसके बाद शराब और मांस का भोज हुआ. पारंपरिक औपचारिकता निभाते हुए मेरे परिवार ने दुल्हे के परिवार को शराब और भैंस तथा घरेलू सामान भेंट किए, ताकि हमारा विवाह अच्छे से हो सके. मगर कुछ मुद्दों को लेकर लड़के के परिवार वालों ने विवाह से इनकार कर दिया. मुझे अब अपने टूटे हुए पवित्र प्रस्ताव की खातिर जिंदगी भर उसका इंतजार करते हुए विधवा की तरह रहना होगा. मैं जानती हूं कि वह कभी नहीं आएगा, लेकिन हमारी परंपरा हमें ऐसा करने को मजबूर करती है.”

ओड़िशा के नियामगिरी पहाड़ी की तराई में रहने वाली टांगिरी वाडेबा इलाके की उन महिलाओं में से हैं, जिन्होंने अपनी खुशियों की उम्मीद में जाने कितनी रातें गुजार दीं लेकिन उनके हिस्से एक ऐसा सुरंग आया, जिसका रास्ता कहीं खुलता ही नहीं था.

दूसरी ओर, टांगिरी वाडेबा से शादी टूटने के बाद लड़के ने कहीं और विवाह कर लिया.

डोंगरिया कोंध की कठोर परंपराओं की वजह से युवा महिलाओं को वैवाहिक प्रस्ताव टूटने की स्थिति में विधवा की तरह रहना होता है क्योंकि वे मानते हैं कि वे पवित्र नहीं रहीं, इसलिए उनका कहीं और विवाह नहीं हो सकता.

टांगिरी ही नहीं राइलिमा गांव में 20 से ज्यादा महिलाएं यह त्रासदी झेल रही हैं. इनमें से कई महिलाएं तीस से चालीस बरस की हो गई हैं और उस व्यक्ति की राह देख रही हैं, जो उनके जीवन में सबसे पहले आया था कि वह फिर लौट आएगा.

काड्रका टांगिरी, हुईका गुडी, हुइका मेदिरी, हुईका बारी, काड्रका अम्बे, हुईका सुनु, सिक्कालट, आमलू, हुईका सीतामा, हुईका लच्छमा और.... ये ऐसी ही कुछ महिलाओं के नाम हैं. ग्रामीण बताते हैं कि रायलिमा ही क्यों आसपास के अनेक गांवों में ऐसी सैकड़ों महिलाएं हैं, जिनकी नियति तानगिरी जैसी ही है.

व्यवस्था और परंपराएं तो समाज की बेहतरी के लिए होती हैं, लेकिन इस बेतुकी परंपरा ने रायगड़ा जिले के कल्याणसिंहपुर ब्लाक की डोंगरिया महिलाओं का जीवन दूभर कर दिया है. नियामगिरी पहाडिय़ों में कल्याणसिंहपुर की सुनाहंडी पंचायत में पुराना आदिवासी गांव रायलिमा स्थित है. यहां पीढिय़ों से डोंगरियां कोंध आदिवासी रहते हैं.



मैंने वहां ऐसी अनेक महिलाओं को देखा जिनके सिर मुंडे हुए थे, वे सफेद साडिय़ां पहनी हुई थीं और उनके शरीर में ऐसा कोई गहना भी नजर नहीं आया जो कि अक्सर कोंध लड़कियां और महिलाएं पहनी रहती हैं. उन्हें देखकर मुझे लगा, मानो वे विधवा हैं. लेकिन पता चला कि इन गरीब महिलाओं को रूढिय़ों ने इस तरह से रहने को मजबूर किया है.

डोंगरिया आदिवासियों की एक और परंपरा है, जिसके मुताबिक गांव के आखिरी छोर पर क्लबनुमा घर होता है, जहां युवा आदिवासी एक दूसरे घुलते-मिलते हैं और अंतरंग होते हैं. यहां प्रेम पनपता है. उसके बाद परिजन इस रिश्ते को विवाह के अंजाम तक पहुंचाते हैं. लड़के के परिजन लड़की के परिजनों से मिलते हैं और विवाह की पेशकश करते हैं, साथ में शराब और भैंस का उपहार देते हैं.

यदि दूसरा पक्ष राजी हो जाए, तो बदले में उसे लड़के वालों को इन्हीं चीजों के साथ घरेलू सामान उपहार में देने होते हैं. एक तरह से यह विवाह प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत होती है, जिसकी परिणती उनके विवाह के रूप में होती है.

हालांकि युवा इतने भाग्यशाली नहीं होते कि उनका कोई रिश्ता बन ही जाए. उन्हें पारिवार से तय होने वाली शादी के जरिये ही घर बसाना होता है. मगर कई बार असहमतियां होने के कारण ऐसे प्रस्ताव टूट जाते हैं और फिर इसका खामियाजा सिर्फ लड़की को भुगतना पड़ता है और उसे जिंदगी भर उस व्यक्ति का इंतजार करना पड़ता है, जिससे उसके कभी रिश्ते बने थे. ऐसे मामलों में लड़के वालों को तोहफे लौटाने पड़ते हैं. मगर इस तरह का शायद ही कोई मामला पुलिस तक पहुंचता है.

मैंने राइलीमा की अनेक ऐसी शोषित महिलाओं से उनके जिंदगी के संघर्ष के बारे में बात की. उन्होंने घबराते हुए सपनों के बारे में बताया, उन सपनों के बारे में जो ध्वस्त हो चुके हैं, वे भी जो अब भी उनकी आंखों में हैं.

वे अपने भावी दुल्हे का इंतजार कर रही हैं, जो कभी नहीं आने वाले. विवाह की उनकी उम्र अब गुजर चुकी है और अब उनके पास अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखरेख करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है. नियामगिरी पहाडिय़ों पर विश्वास कर वे संघर्ष कर रही हैं. वे सामान्य जिंदगी जीना चाहती हैं. वे कहती हैं कि किसी तरह की सरकारी मदद मिल जाए तो उनका संघर्ष कम हो सकता है.

डीकेडीए यानी डोंगरिया कोंध विकास एजेंसी और वन विभाग द्वारा एकत्र किए गए आंकड़े बताते हैं कि अभी डोंगरिया आदिवासियों की आबादी 7,952 है. डोंगरिया कोंध पर शोध करने वाले उदय चंद्र पांडा ने बताया कि लड़कियां सिर्फ अपनी परंपरा के सम्मान में विधवा बनी रहती हैं. इस सामाजिक परंपरा की वजह से उनकी आबादी में वृद्धि नहीं हो पा रही है. ऐसे में सरकार और समाज को उन्हें बताना चाहिए कि यह परंपरा उनके अस्तित्व के लिए घातक साबित हो रही है.

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